जब कोई सरकार पूर्व नौकरशाहों और पेशेवर लोगों (प्रोफेशनल्स) के हाथ में पड़ जाए, तो क्या हो सकता है, इसकी संभवतः सबसे अच्छी मिसाल पिछले कुछ दिनों में देखने को मिली है। एक योगगुरु, जिनकी राजनीतिक महत्त्वाकांक्षा किसी से छिपी नहीं है, वे काला धन खत्म करने जैसे निराकार मांग को लेकर अनशन का एलान करते हैं और लोकतांत्रिक जनादेश से निर्वाचित सरकार उनके सामने रेंगने लगती है, यह नजारा देश के दीर्घकालिक भविष्य के लिए चिंतित किसी व्यक्ति को परेशान कर सकता है। या तो इस सरकार के कर्ता-धर्ताओँ में चालबाजी की अपनी क्षमता पर अति-भरोसा था, या बाबा रामदेव के अनशन के कार्यक्रम ने उन्हें बदहवास कर दिया था। वरना कोई वजह नहीं थी कि जब रामदेव उज्जैन से निजी चार्टर्ड विमान से दिल्ली हवाई अड्डे पर पहुंचे, तो वहां चार वरिष्ठ मंत्री उनकी अगवानी और वहीं उन्हें समझा लेने के इरादे से पहुंच गए। उसके बाद शुक्रवार को दो मंत्रियों ने एक फाइव स्टार होटल में बाबा से घंटों बात कर उन्हें समझाने की कोशिश की।
क्या यूपीए सरकार के पास इतनी भी राजनीति समझ नहीं है कि वह रामदेव की असली इरादे और उनके पीछे खड़ी ताकतों को पहचान सके? क्या रामदेव ने रामलीला मैदान में फाइव स्टार स्तर की तैयारी इसलिए की थी कि अंतिम वक्त पर वे अपना अनशन वापस ले लेते? बाबा रामदेव 2014 के चुनाव में देश भर में अपने उम्मीदवार उतारने की घोषणा बहुत पहले कर चुके हैं। वे उसकी जमीन तैयार कर रहे हैं। वे अन्ना हजारे की तरह किसी एक स्पष्ट मांग को लेकर अनशन पर नहीं बैठे हैं, बल्कि वे “व्यवस्था बदलना” चाहते हैँ। उनके पीछे धनी और मध्य वर्ग की पूरी फौज है, जिन लोगों की अपनी महत्त्वाकांक्षाएं हैं। फिर दक्षिणपंथी और रुढ़िवादी गोलबंदी का मौका देखते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक पूरी ताकत से बाबा के साथ खड़ा हो गया है।
इसलिए बाबा की चुनौती भ्रष्टाचार के मुद्दे पर नहीं, बल्कि राजनीतिक है। अगर कांग्रेस में थोड़ी भी राजनीतिक दृष्टि होती, तो वह इस चुनौती का विचार और राजनीति के मैदान में मुकाबला करती। लेकिन जब कोई पार्टी ऐसे लोगों से भरी हो, जिनके लिए राजनीति का मतलब निजी करियर, समृद्धि और प्रभाव को प्राप्त करना एवं बढ़ाना हो, तो उससे आप ऐसे सियासी नजरिए की उम्मीद नहीं कर सकते। तब एकमात्र नजरिया होता है कि किसी चुनौती का फ़ौरी हल निकालकर फिलहाल उसे टाल दिया जाए। प्रणब मुखर्जी, कपिल सिब्बल, सुबोधकांत सहाय आदि यही कोशिश करते हुए घुटनाटेक आसन में नजर आए हैं।
मनमोहन सिंह सरकार की मुश्किल यह है कि उसके राज में भ्रष्टाचार इस हद तक पहुंच गया है कि उसके पास कोई नैतिक चेहरा नहीं है। क्रोनी कैपिटलिज्म का जो खुला खेल पिछले कुछ वर्षों के दौरान हुआ है, उसके फायदे भले कॉरपोरेट जगत और अन्य बहुत से लोगों को मिले हों, लेकिन उससे चेहरा सिर्फ इस सरकार का दागदार हुआ है। इस अपराध बोध ने इस सरकार की जुबान जैसे बंद कर दी है और इसका नज़ारा बार-बार देखने को मिल रहा है।
वरना, सरकार और कांग्रेस कम से कम रामदेव के मुद्दे पर वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह के साथ खड़ी दिखतीं। दिग्विजय सिंह ने रामदेव के कारोबार, उनकी संपत्ति, उनके इरादों और उनके साथियों पर जो सवाल उठाए हैं, वे प्रासंगिक हैं। योगगुरु के रूप में बाबा ने योग, दवाओं, खाद्य सामग्रियों आदि का जो कारोबार फैलाया है, वह गौरतलब है। उनकी जिंदगी अन्ना हजारे की तरह सीधी-सादी नहीं है। उनके आसपास प्रभावशाली और धनी-मानी लोगों का जमावड़ा है। वे खास ढंग के सामाजिक और राजनीतिक विचारों के प्रवक्ता बनकर उभरे हैं और उनकी राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाएं किसी से छिपी हुई नहीं हैं। ऐसे में दिग्विजय सिंह अगर उन्हें काले धन के खिलाफ लड़ाई के लिए गलत आइकॉन बताते हैं, तो इस बात को यूं ही खारिज नहीं किया जा सकता।
मनमोहन सिंह सरकार शायद यह भूल गई है कि वह जनादेश से चुनी गई है और वह सबसे पहले संसद और विपक्ष के प्रति जवाबदेह है। इसके बावजूद वह कथित सिविल सोसायटी के प्रति नत-मस्तक नजर आती है। लोकपाल बिल पर भी उसने विपक्ष की राय तब मांगी, जब सिविल सोसायटी के प्रतिनिधियों से उसके गहरे मतभेद उभर गए। हालांकि अपनी राय अभी न देने के पीछे भारतीय जनता पार्टी की अपनी गणना एवं राजनीतिक चाल है, लेकिन ऊपरी तौर पर उसका यह कहना वाजिब है कि जब शुरुआत से उसे इस प्रक्रिया में शामिल नहीं किया गया, तो वह अभी अपनी राय क्यों दे? उसका संसद में अपनी राय बताने का रुख भी फेस वैल्यू पर सही है। जाहिर है, सरकार ऐसे तौर-तरीकों से अपने बुने जाल से निकलने में कामयाब नहीं हो सकती।
अब काले धन के मुद्दे पर भी उसने रामदेव के आगे समर्पण कर भविष्य में अपने लिए कई मुसीबतों को न्योता दिया है। ऐसे समझौतों से इस सरकार की साख लगातार खत्म हो रही है। इस लिहाज से रामदेव और उनके साथी एक जंग जीत चुके हैं। यूपीए सरकार के लिए यह शर्मनाक स्थिति है।
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