Sunday, June 19, 2011

क्या राज्य नागरिकों का दुश्मन है?


सत्येंद्र रंजन

क्या राज्य और नागरिक के बीच अनिवार्य द्वैत है और यह न सिर्फ अंतर्विरोधी, बल्कि अक्सर दुश्मनी भरा भी है? सिविल सोसायटी के नाम पर सामाजिक एवं एक हद तक राजनीतिक वैधता की तलाश कर रहे समाज के एक हिस्से की सक्रियताओं के मद्देनजर यह सवाल इन समय खासा प्रासंगिक हो उठा है। फिलहाल इस सिविल सोसायटी का मुद्दा भ्रष्टाचार है और अगर उसके नजरिए से सोचें तो यह इस वक्त देश का सबसे बुनियादी सवाल है। स्पष्टतः भ्रष्टाचार को उसके समूचे सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भों से काटकर एक राजनीतिक मुद्दा बनाने के मौजूदा प्रयासों से समाज का एक बड़ा तबका सहमत नहीं है। ना ही वह इस समूह एवं उसके समर्थकों द्वारा प्रातिनिधिक लोकतंत्र एवं संवैधानिक व्यवस्था के प्रति जताए जाने वाले अपमान भाव से इत्तेफ़ाक रखता है। सिविल सोसायटी के समर्थक बुद्धिजीवियों की सुनें, तो ये असहमत लोग राज्यवादी हैं।

उन बुद्धिजीवियों की नजर में राज्यवादी होने का मतलब है कि आप जन-हित की कीमत पर सरकार का समर्थन करते हैं। जाहिर है, जन-हित क्या है, इसे वे बुद्धिजीवी ही परिभाषित करते हैं। यानी जिसे वे जन-हित मानते हैं, अगर उससे आपकी राय अलग हो, तो उनकी नजर में आप राज्यवादी होंगे। बहरहाल, बहस के इस पक्ष पर फिलहाल ना जाते हुए यहां हम खुद को सिर्फ इस सवाल पर केंद्रित रखते हैं कि क्या प्रातिनिधिक जनतंत्र की एक व्यवस्था में राज्य और नागरिक के बीच अनिवार्य विरोधाभास है? इस सवाल पर आज इसलिए विस्तृत चर्चा की जरूरत है क्योंकि सिविल सोसायटी की बढ़ती सामाजिक गतिविधियों के साथ सार्वजनिक विमर्श में अक्सर राज्य की दैत्याकार और भयावह छवि पेश करने का चलन बढ़ता गया है। क्या सचमुच भारतीय राज्य ऐसा ही है?

राज्य अगर सामाजिक वर्ग संरचना की अभिव्यक्ति है, तो कोई भी सरकार वर्ग संबंधों के बीच शक्ति एवं हितों के संतुलन का सहज परिणाम होती है। उस सरकार को जवाबदेह और आम जन के हितों की एजेंसी बनाने का एकमात्र रास्ता समाज व्यवस्था का उत्तरोत्तर लोकतंत्रीकरण है और यह अनिवार्य रूप से एक राजनीतिक प्रक्रिया है। पिछले साठ साल का इतिहास यह है कि यह प्रक्रिया तमाम झटकों एवं कमजोरियों के बावजूद आगे बढ़ी है और आज का भारतीय राज्य इतिहास के पिछले किसी मौके की तुलना में ज्यादा जनतांत्रिक है। जनतंत्र के प्रयोग का परिणाम अवरोध एवं संतुलन की व्यवस्थाओं के क्रमिक रूप से मजबूत होने के रूप में सामने आया है और इस तथ्य को कुछ फ़ौरी घटनाओं की नज़ीर देकर झुठलाया नहीं जा सकता। इस परिघटना में नागरिक की ताकत अपेक्षाकृत बढ़ी है और यह क्रम जारी है। यही भारतीय लोकतंत्र की एक ठोस उपलब्धि रही है।

मगर यह उपलब्धि हमें तब नजर आती है, जब हम इतिहास के प्रति एक दीर्घकालिक नजरिया अपनाते हैं। तब हमें नजर आता है कि राज्य-व्यवस्था को संचालित करने में आज नागरिक की भूमिका पहले के किसी मौके की तुलना में ज्यादा है। ये नागरिक ही प्रातिनिधिक जनतंत्र की असली ताकत है। एक वर्ग विभाजित समाज में, जहां आर्थिक एवं सामाजिक विषमता की खाई बहुत चौड़ी हो, वहां यह स्वाभाविक है कि व्यवस्था सुविधा-संपन्न नागरिक समूहों के हित में चले और चलती हुई दिखे। लेकिन जनतंत्र की इस विसंगति को दूर करने का एकमात्र तरीका उस राजनीति को विकिसित और मजबूत करना है, जो राजकाज में वंचित समूहों के हितों की न सिर्फ वकालत करे, बल्कि उन्हें सुरक्षित भी करे। दुर्भाग्य से हाल के समय में ऐसी राजनीति के कमजोर होने के संकेत मिले हैं।

परंतु उस राजनीति का विकल्प जनतंत्र की प्रक्रिया को लांछित करना नहीं है। ना ही यह चित्रित करना तार्किक है कि मौजूदा राज्य-व्यवस्था का नागरिक हितों से सीधा टकराव है। बल्कि हकीकत यह है कि यह राज्य-व्यवस्था हमारी मौजूदा सामाजिक-आर्थिक (एवं सांस्कृतिक भी) परिस्थितियों का सहज परिणाम है। सिविल सोसायटी की सामने आई पूरी परिघटना जब इस हकीकत की अनदेखी करती है, अपना सारा गुस्सा एक राजनेताओं के खास समूह पर केंद्रित करती है, प्रातिनिधिक जनतंत्र की संस्थाओं के प्रति अपमान-भाव एवं अपशब्दों का इस्तेमाल करती है, तो यह सवाल उठाना जरूरी हो जाता है कि आखिर यह सिविल सोसायटी किसका प्रतिनिधित्व करती है? सही होने की आत्म-वंचना से ओत-प्रोत, खुद अपने वर्ग-चरित्र एवं आम व्यवहार से नावाकिफ (या ऐसा दिखाने की कोशिश करने वाले) इन समूहों द्वारा बताई गई देश की मुख्य समस्या एवं समाधान से आखिर हर नागरिक को क्यों सहमत हो जाना चाहिए? और यह सवाल सिविल सोसायटी के समर्थक बुद्धिजीवियों से है कि रामदेव के जमावड़े पर मामूली पुलिस कार्रवाई से उन्हें इमरजेंसी से जालियांबाग तक याद आए, लेकिन उसी वक्त पर पोस्को के लिए भूमि-अधिग्रहण से अपनी जमीन बचाने के लिए संघर्षरत परिवारों के मासूम बच्चों के बरसते पानी के बीच खड़ा रहने से उनकी संवेदना क्यों विचलित नहीं होती है?

अपने असहमत लोगों को राज्यवादी बताकर अगर वे उनके प्रति अपमान का भाव जताते हैं, तो क्या उपरोक्त प्रश्नों की रोशनी में क्या उनसे यह नहीं पूछा जाना चाहिए कि क्या वे उस परिघटना का शिकार नहीं हो गए हैं, जिन्हें डॉ. बीआर अंबेडकर ने अराजकता का व्याकरण कहा था। बहरहाल, ये तमाम सवाल हमें आगाह करते हैं कि हमें हर चलती हवा में बह नहीं जाना चाहिए। हमें संघर्ष के वर्गीय संदर्भों से आंख नहीं मूंदनी चाहिए। देश के वास्तविक एवं मुख्य अंतर्विरोध समाज एवं उसके आर्थिक ढांचे में निहित हैं। भ्रष्टाचार का संदर्भ कहीं गहरा है, इसका संबंध निरंकुश व्यवस्था में मानव के स्वभाव और उसके सांस्कृतिक इतिहास में छिपा है। इसे रोकने के लिए अवरोध एवं संतुलन की व्यवस्थाएं जरूर मजबूत होनी चाहिए, लेकिन उसके एक पहलू को लेकर कुछ महत्त्वाकांक्षी लोगों द्वारा बनाए गए भ्रम का शिकार सबको नहीं हो जाना चाहिए।

जनतंत्र निसंदेह सिर्फ निर्वाचित प्रतिनिधियों का ही अखाड़ा नहीं है। ना ही जनतंत्र का मतलब सिर्फ चुनाव है। नागरिकों का हस्तक्षेप इसका एक महत्त्वपूर्ण पहलू है। व्यक्तिगत या सामूहिक स्तर पर नागरिकों के राजनीतिक मुद्दों पर सक्रिय होने और समस्याओं के समाधान में भूमिका निभाने के अवसर जनतंत्र को समृद्ध करने के लिए ही नहीं, बल्कि इसका अस्तित्व कायम रहने के लिए जरूरी है। मगर मुश्किल तब होती है, जब कोई समूह जनतंत्र की वास्तविक प्रक्रिया से खुद को ऊपर मानने लगता है। वह नैतिकता का सारा ठेका ले लेता है और बाकी सबको भ्रष्ट एवं निकम्मा समझने लगता है। 

Friday, June 3, 2011

शर्मनाक सरकार!


जब कोई सरकार पूर्व नौकरशाहों और पेशेवर लोगों (प्रोफेशनल्स) के हाथ में पड़ जाए, तो क्या हो सकता है, इसकी संभवतः सबसे अच्छी मिसाल पिछले कुछ दिनों में देखने को मिली है। एक योगगुरु, जिनकी राजनीतिक महत्त्वाकांक्षा किसी से छिपी नहीं है, वे काला धन खत्म करने जैसे निराकार मांग को लेकर अनशन का एलान करते हैं और लोकतांत्रिक जनादेश से निर्वाचित सरकार उनके सामने रेंगने लगती है, यह नजारा देश के दीर्घकालिक भविष्य के लिए चिंतित किसी व्यक्ति को परेशान कर सकता है। या तो इस सरकार के कर्ता-धर्ताओँ में चालबाजी की अपनी क्षमता पर अति-भरोसा था, या बाबा रामदेव के अनशन के कार्यक्रम ने उन्हें बदहवास कर दिया था। वरना कोई वजह नहीं थी कि जब रामदेव उज्जैन से निजी चार्टर्ड विमान से दिल्ली हवाई अड्डे पर पहुंचे, तो वहां चार वरिष्ठ मंत्री उनकी अगवानी और वहीं उन्हें समझा लेने के इरादे से पहुंच गए। उसके बाद शुक्रवार को दो मंत्रियों ने एक फाइव स्टार होटल में बाबा से घंटों बात कर उन्हें समझाने की कोशिश की।

क्या यूपीए सरकार के पास इतनी भी राजनीति समझ नहीं है कि वह रामदेव की असली इरादे और उनके पीछे खड़ी ताकतों को पहचान सके? क्या रामदेव ने रामलीला मैदान में फाइव स्टार स्तर की तैयारी इसलिए की थी कि अंतिम वक्त पर वे अपना अनशन वापस ले लेते? बाबा रामदेव 2014 के चुनाव में देश भर में अपने उम्मीदवार उतारने की घोषणा बहुत पहले कर चुके हैं। वे उसकी जमीन तैयार कर रहे हैं। वे अन्ना हजारे की तरह किसी एक स्पष्ट मांग को लेकर अनशन पर नहीं बैठे हैं, बल्कि वे व्यवस्था बदलना चाहते हैँ। उनके पीछे धनी और मध्य वर्ग की पूरी फौज है, जिन लोगों की अपनी महत्त्वाकांक्षाएं हैं। फिर दक्षिणपंथी और रुढ़िवादी गोलबंदी का मौका देखते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक पूरी ताकत से बाबा के साथ खड़ा हो गया है।

इसलिए बाबा की चुनौती भ्रष्टाचार के मुद्दे पर नहीं, बल्कि राजनीतिक है। अगर कांग्रेस में थोड़ी भी राजनीतिक दृष्टि होती, तो वह इस चुनौती का विचार और राजनीति के मैदान में मुकाबला करती। लेकिन जब कोई पार्टी ऐसे लोगों से भरी हो, जिनके लिए राजनीति का मतलब निजी करियर, समृद्धि और प्रभाव को प्राप्त करना एवं बढ़ाना हो, तो उससे आप ऐसे सियासी नजरिए की उम्मीद नहीं कर सकते। तब एकमात्र नजरिया होता है कि किसी चुनौती का फ़ौरी हल निकालकर फिलहाल उसे टाल दिया जाए। प्रणब मुखर्जी, कपिल सिब्बल, सुबोधकांत सहाय आदि यही कोशिश करते हुए घुटनाटेक आसन में नजर आए हैं।

मनमोहन सिंह सरकार की मुश्किल यह है कि उसके राज में भ्रष्टाचार इस हद तक पहुंच गया है कि उसके पास कोई नैतिक चेहरा नहीं है। क्रोनी कैपिटलिज्म का जो खुला खेल पिछले कुछ वर्षों के दौरान हुआ है, उसके फायदे भले कॉरपोरेट जगत और अन्य बहुत से लोगों को मिले हों, लेकिन उससे चेहरा सिर्फ इस सरकार का दागदार हुआ है। इस अपराध बोध ने इस सरकार की जुबान जैसे बंद कर दी है और इसका नज़ारा बार-बार देखने को मिल रहा है।

वरना, सरकार और कांग्रेस कम से कम रामदेव के मुद्दे पर वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह के साथ खड़ी दिखतीं। दिग्विजय सिंह ने रामदेव के कारोबार, उनकी संपत्ति, उनके इरादों और उनके साथियों पर जो सवाल उठाए हैं, वे प्रासंगिक हैं। योगगुरु के रूप में बाबा ने योग, दवाओं, खाद्य सामग्रियों आदि का जो कारोबार फैलाया है, वह गौरतलब है। उनकी जिंदगी अन्ना हजारे की तरह सीधी-सादी नहीं है। उनके आसपास प्रभावशाली और धनी-मानी लोगों का जमावड़ा है। वे खास ढंग के सामाजिक और राजनीतिक विचारों के प्रवक्ता बनकर उभरे हैं और उनकी राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाएं किसी से छिपी हुई नहीं हैं। ऐसे में दिग्विजय सिंह अगर उन्हें काले धन के खिलाफ लड़ाई के लिए गलत आइकॉन बताते हैं, तो इस बात को यूं ही खारिज नहीं किया जा सकता।

मनमोहन सिंह सरकार शायद यह भूल गई है कि वह जनादेश से चुनी गई है और वह सबसे पहले संसद और विपक्ष के प्रति जवाबदेह है। इसके बावजूद वह कथित सिविल सोसायटी के प्रति नत-मस्तक नजर आती है। लोकपाल बिल पर भी उसने विपक्ष की राय तब मांगी, जब सिविल सोसायटी के प्रतिनिधियों से उसके गहरे मतभेद उभर गए। हालांकि अपनी राय अभी न देने के पीछे भारतीय जनता पार्टी की अपनी गणना एवं राजनीतिक चाल है, लेकिन ऊपरी तौर पर उसका यह कहना वाजिब है कि जब शुरुआत से उसे इस प्रक्रिया में शामिल नहीं किया गया, तो वह अभी अपनी राय क्यों दे? उसका संसद में अपनी राय बताने का रुख भी फेस वैल्यू पर सही है। जाहिर है, सरकार ऐसे तौर-तरीकों से अपने बुने जाल से निकलने में कामयाब नहीं हो सकती।

अब काले धन के मुद्दे पर भी उसने रामदेव के आगे समर्पण कर भविष्य में अपने लिए कई मुसीबतों को न्योता दिया है। ऐसे समझौतों से इस सरकार की साख लगातार खत्म हो रही है। इस लिहाज से रामदेव और उनके साथी एक जंग जीत चुके हैं। यूपीए सरकार के लिए यह शर्मनाक स्थिति है।