Friday, May 13, 2011

लेफ्ट के ढहने का मतलब


पांच विधानसभा चुनाव के नतीजों में सबसे दूरगामी महत्त्व का नतीजा बेशक पश्चिम बंगाल का है। केरल में वाम लोकतांत्रिक मोर्चे (एलडीएफ) की हार ने इस परिणाम को और गंभीर बना दिया है। इन दोनों राज्यों के चुनाव नतीजों का साझा परिणाम यह है कि अब राष्ट्रीय राजनीति में तीसरी धुरी उभरने की संभावना फिलहाल लगभग खत्म हो गई है। यह धुरी अतीत में जब भी उभरी, उसके केंद्र में वाम मोर्चा था। ऐसा इसलिए था, क्योंकि मौजूदा सियासी माहौल में सिर्फ वही वैकल्पिक नीतियों के साथ खड़ा नजर आता है। चूंकि आर्थिक एवं विकास नीतियों पर बाकी सभी दलों के बीच कोई अंतर नहीं है, इसलिए वाम मोर्चा अपनी अलग पहचान के साथ असल में दूसरा विकल्प पेश करता था। बहरहाल, चूंकि राष्ट्रीय राजनीति कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के ध्रुवों में बंटी हुई है, जिनके बीच मुख्य फर्क आर्थिक नीतियों को लेकर नही, बल्कि सामाजिक एवं सांस्कृतिक नीतियों पर है, इसलिए वाम मोर्चे पर इकट्टी होने वाली धुरी को सामान्यतः तीसरी धुरी के रूप में देखा जाता था।

पश्चिम बंगाल और केरल में हार के बाद फिलहाल वाम मोर्चा की ताकत और सियासी हैसियत दोनों में इतना ह्रास हो गया है कि वह संसद में या संसद के बाहर कोई बड़ी चुनौती पेश करने की स्थिति में अब नहीं है। इस स्थिति पर अभी भले कांग्रेस बेहद खुश हो, लेकिन यह स्थिति सबसे ज्यादा माफिक भारतीय जनता पार्टी को बैठती है। भाजपा के रणनीतिकार लंबे समय से उस दिन के इंतजार में रहे हैं, जब राजनीति कांग्रेस एवं भाजपा की धुरियों पर सिमट जाए। सीधी टक्कर में भाजपा अक्सर फायदे में रहती है। और अगर राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा ही विकल्प दिखे, तो इससे उसके प्रसार का मौका भी बनता है।

जब केंद्र में कोई तीसरा मोर्चा उभरने की संभावना ही नहीं रहे, तो राज्यों में कांग्रेस से सीधा टकराव रखने वाले क्षेत्रीय दल आखिर किस धुरी पर इकट्ठे होंगे? मसलन, अगर केंद्र में नए समीकरण बनने के हालात पैदा हों, तो तमिलनाडु में आंधी सा उठा अन्ना द्रमुक, बीजू जनता दल या तेलुगू देशम पार्टी दिल्ली में खुद को किससे जोड़ेंगे? या जगनमोहन रेड्डी अथवा तेलंगाना राष्ट्र समिति का समर्थन किसके हक में जाएगा? इसलिए अगर शुक्रवार को आए चुनाव नतीजों से भाजपा के रणनीतिकार राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) को नया जीवनदान मिलने की उम्मीद करें, तो वह शायद गलत नहीं होगा।

राष्ट्रीय राजनीति में वाम मोर्चे के कमजोर होने या अपनी अहमियत खो देने का असर यही है कि राजनीतिक एजेंडे में आर्थिक मुद्दे एवं आम आदमी के रोजी-रोजी के मसले अपनी प्राथमिकता खो देंगे। जैसाकि की एनडीए के शासनकाल में हुआ था, जब सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, सांप्रदायिकता, आतंकवाद, पाकिस्तान विरोध आदि जैसे मुद्दे राष्ट्रीय चर्चा पर छाये रहते थे। उस दौर में पश्चिम बंगाल के अपने लाल किले से सुरक्षित वाम मोर्चे ने नीतियों और कार्यक्रमों के आधार पर चर्चा में नया आयाम जोड़ने में कामयाबी पाई थी। उसका परिणाम 2004 के लोकसभा चुनाव में देखने को मिला और यह उसी दौर में उभरी राजनीति का परिणाम था कि जब यूपीए की पहली सरकार बनी, तो साझा न्यूनतम कार्यक्रम के रूप में देश के सामने एक सोशल डेमोक्रेटिक एजेंडा आया।

वह एजेंडा यूपीए शासनकाल के पहले तीन साल में सिर्फ कागज का एजेंडा साबित हो गया, हालांकि वाम मोर्चे के दबाव से मनरेगा, आरटीआई, वन अधिकार कानून, आदि जैसे कुछ दीर्घकालिक महत्त्व के कानूनी प्रावधान अस्तित्व में आ सके। लेकिन मनमोहन सिंह सरकार के अमेरिका से रिश्ते मजबूत करने के अति उत्साह ने वह राजनीतिक तालमेल भंग कर दिया। उसके बाद वाम मोर्चे ने 2009 के चुनाव में तीसरे मोर्चे को उभारने की फिर कोशिश की। लेकिन वह कोशिश नाकाम रही और इसकी एक बड़ी वजह अपने ही गढ़ों में लेफ्ट की खुद अपनी हार थी। ताजा चुनाव परिणामों ने उस परिघटना की नए सिरे से पुष्टि कर दी है।

संसदीय राजनीति से बाहर ऐसी स्थिति चरमपंथी संगठनों के माफिक बैठती है। मसलन, माओवादी भी लंबे समय से उस दिन के इंतजार में थे, जब संसदीय लेफ्ट अपना महत्त्व खो दे और जन संघर्षों की पूरी जमीन पर वे अपना दावा कर सकें। पश्चिम बंगाल के ताजा चुनाव नतीजों में माओवादियों का योगदान कम नहीं है। नंदीग्राम को युद्ध जैसे क्षेत्र में आखिर उन्होंने ही बदला था, जहां पुलिस फायरिंग के बाद लेफ्ट के पांव के नीचे की जमीन भहराने लगी थी। अब माओवादी अपना मकसद हासिल कर लेंगे, कहना मुश्किल है। मगर यह जरूर है कि इस पूरे घटनाक्रम ने नव-उदारवादी आर्थिक नीतियों, दक्षिणपंथी सियासी रुझानों एवं वाम चरमपंथ के लिए पहले से ज्यादा अनुकूल जमीन तैयार कर दी है। 

1 comment:

  1. सर्येंद्रजी..

    चुनाव के परिणामो को बहु आयामी तरीके से रखने के लिए धन्यवाद... इस तरह के लेख से मुझे अलग दिशा मिली...

    आभार..

    क्रिष्णा

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