Sunday, May 29, 2011

नए लेफ्ट के दिवास्वप्न


सत्येंद्र रंजन

पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चे की हार को कई बुद्धिजीवी इस उम्मीद में एक सकारात्मक घटना मान रहे हैं कि इससे देश में एक नए वामपंथ के उदय की संभावना पैदा हुई है। उनकी राय में इससे अपेक्षाकृत ज्यादा मजबूत वामपंथी आंदोलन के लिए जगह बनी है, जिसे आप चाहें तो नव-वामपंथ कह सकते हैं- एक ऐसा वामपंथ जो आम जन की आकांक्षाओं को ज्यादा रचनात्मक रूप से प्रतिबिंबित कर सके और जिसमें ज्यादा कल्पनाशीलता एवं ज्यादा ईमानदारी हो। दावा है कि भारत में कभी लेफ्ट का मतलब सिर्फ संसदीय लेफ्ट पार्टियों से नहीं रहा और उन समूहों से भी नहीं, जो जंगलों में रहकर लड़ाई में (यानी माओवादी) लगे हैं। इसके विपरीत देश में संगठनों, आंदोलनों एवं विभिन्न प्रकार के संघर्षों का व्यापक दायरा है। इस लंबी परंपरा का जिक्र करते हुए कुछ बुद्धिजीवियों ने इसके तहत फुले और अंबेडकर की परंपरा से लेकर लोकतांत्रिक समाजवादी आंदोलन और जल-जंगल-जमीन के मुद्दे पर चल रहे जन आंदोलनों की पहचान की है।

मगर प्रश्न यह है कि अगर यह व्यापक दायरा या लंबी परंपरा नव-वामपंथ का निर्माण कर सकने में सक्षम है, तो उसे अब तक ऐसा करने से किसने रोका था? अगर सीपीएम के कैडर राज ने पश्चिम बंगाल में ऐसा नहीं होने दिया, तो बाकी देश में उन्होंने ऐसे प्रयोग क्यों नहीं किए? और अब पश्चिम बंगाल में लेफ्ट फ्रंट के हार जाने से आखिर ऐसी क्या स्थिति पैदा हो गई है, जिससे ये बिखरे आंदोलन और संगठन मिलकर अब एक नव-वामपंथ की संगठित धारा पैदा कर देंगे? बात आगे बढ़ाने से पहले यह स्पष्ट कर लेना उचित होगा कि यह किसी का दावा नहीं है कि भारत में सिर्फ सीपएम या लेफ्ट फ्रंट ही वामपंथ है। यह बात बिल्कुल ठीक है कि वामपंथ की सोच एवं गतिविधियों का दायरा उनसे कहीं व्यापक है। इसीलिए लेफ्ट फ्रंट की चर्चा करते समय अक्सर संगठित लेफ्ट शब्द का इस्तेमाल किया जाता रहा है, जिसका अर्थ रहा है कि वामपंथ की वो ताकतें जिन्होंने वाम मुद्दे पर राजनीति करते हुए अपने लिए संसदीय समर्थन आधार भी जुटाया है और जिसकी बदौलत वे राष्ट्रीय राजनीति को वाम मुद्दों से प्रभावित करने की कोशिश करती रही हैं और जिसमें कई बार वे कामयाब भी होती रही हैं।

जिन स्वतंत्र ट्रेड यूनियनों, विस्थापन विरोधी संघर्षों, सांप्रदायिक हिंसा के पीड़ितों को न्याय दिलाने में जुटे संगठनों, और आरटीआई, नरेगा, वनाधिकार कानून एवं खाद्य सुरक्षा कानून जैसे प्रगतिशील कदमों के लिए आंदोलन चलाने वाले समूहों में नव-वामपंथ की उम्मीद तलाशी जा रही है, उनके संदर्भ में यह सवाल प्रासंगिक है कि क्या उनमें सांगठनिक एकता का कोई आधार है, क्या उनमें कोई वैचारिक समानता है और फिर सबसे ऊपर यह कि आखिर उनकी इतिहास दृष्टि क्या है? क्या इनके बिना कोई विचारधारा आधारित सुसंगत राजनीतिक शक्ति उभर सकती है, जो संसदीय राजनीति में दखल बना सकने में सक्षम हो? उपरोक्त तमाम संगठनों की लोकतंत्र के विकासक्रम के संदर्भ में प्रसंशनीय और प्रभावी भूमिका है। मगर इससे हम इस तथ्य से आंख नहीं मूंद सकते कि उनमें अधिकांश का एजेंडा स्थानीय और एक मुद्दा आधारित है। इसीलिए नव-उदारवादी शासन- व्यवस्था के लिए उनसे संवाद बनाना और उन्हें एक हद तक समाहित कर लेना आसान रहा है।

चूंकि समाज द्वंद्वात्मक प्रक्रिया से आगे बढ़ता है, इसलिए इस परिघटना का भी अपना महत्त्व है और इसीलिए कोई भी विवेकशील व्यक्ति इन संगठनों एवं संघर्षों की सकारात्मक भूमिका से इनकार नहीं कर सकता। लेकिन विचार-विमर्श के व्यापक दायरे में इस बात की अनदेखी नहीं की जा सकती कि विस्थापन विरोधी संघर्षों को छोड़कर बाकी तमाम संघर्षों का नेतृत्व एवं गतिविधियों का दायरा मध्य वर्ग में सिमटा हुआ है। अपनी राजनीति स्पष्ट करने की बात तो दूर रही इन समूहों ने कभी राजनीति में उतरने की इच्छा तक नहीं जताई है। उनमें से एक बहुत बड़े हिस्से का पूरा एनजीओकरण हो चुका है और वे सिविल सोसायटी के रूप में अपनी भूमिका से संतुष्ट हैं। वैसे भी स्थानीय, फ़ौरी और एक मुद्दे पर आधारित संघर्षों के साथ अक्सर यह देखा जाता है कि उसमें तीव्रता अपने मुद्दे पर होती है और अगर उस मुद्दे पर सफलता मिल जाए, तो फिर न तो वह संघर्ष और ना ही उसका नेतृत्व राजनीति के व्यापक प्रश्नों पर विचार करते हैं।

और उससे भी ऊपर बात इतिहास दृष्टि की है। मानव, समाज एवं भारतीय राष्ट्र के विकासक्रम पर इस कथित नव-वामपंथ का आखिर क्या नजरिया है? अब तक उनका विमर्श बेहद नकारात्मक, हंगामाखेज और क्षणिक भावनाओं के उबाल पर केंद्रित रहा है। उसमें समाज के द्वंद्व और लोक-चेतना की स्थिति की समझ तो सिरे से गायब ही रही है, उनमें समाज की प्रगति एवं विकास के लक्षणों को देखने और समझने के प्रति भी गजब की उदासीनता नजर आती है। बल्कि ऐसे सकारात्मक एवं विकासशील दृष्टिकोण के प्रति उनमें अपमान का गहरा भाव नजर आता है। ऐसी सोच एवं मनोवैज्ञानिक स्थिति के साथ कैसा नया वामपंथ उभर सकता है, यह विचारणीय प्रश्न है।  

दरअसल, इसी मनोविज्ञान का इज़हार हम लेफ्ट फ्रंट की हार पर खुशी एवं संतोष के अहसास में होते देख रहे हैं। यह लेफ्ट की जगह भरने को आतुर लेकिन राजनीतिक रूप से अक्षम, लेफ्ट के रूप में अपेक्षाकृत सफल- या सबसे बड़ी- ताकत से उनके बिरादराना द्रोह और मनोगत उम्मीदों की साझा अभिव्यक्ति है। यह ऐतिहासिक अनुभव है कि जाने या अनजाने में, ऐसी ताकतें व्यवहार में उन शक्तियों की राह सुगम करने का काम करती हैं, जिन्हें वे अपना मुख्य शत्रु बताती हैं। नव-वामपंथ के ताजा दिवास्वप्न की भूमिका भी उससे अलग नहीं है। 

1 comment:

  1. अपने देश में पिछले कुछ वर्षों से एक फॅशन बन गया है - संघटित वामपंथ के खिलाफ मोर्चा खडा करके खुद को उनसे अधिक वामपंथी साबित करने की होड सी लगी है। इस फॅशन का खोखलापन स्पष्ट करने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद। आशा है कि तथाकथित नव-वामपंथी साथी भी इसे पढेंगे और गौर करेंगे।

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