Wednesday, May 25, 2011

लेफ्ट के आगे विकास नीति की चुनौती


सत्येंद्र रंजन

प्रकाश करात को भरोसा है कि वाम मोर्चा अपनी गलतियों में सुधार करेगा और एक बार फिर से पश्चिम बंगाल की जनता का विश्वास जीत लेगा। करात और उनकी पार्टी (माकपा) को फिलहाल मुख्य वर्गों यानी खेतिहर एवं औद्योगिक मेहनतकश तबकों पर आधारित बुनियादी सियासी रणनीति के सही होने पर कोई संदेह नहीं है। लेकिन भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव एबी बर्धन जरूरत महसूस करते हैं कि वामपंथ अब देश के मध्य वर्ग से संवाद बनाए, क्योंकि यह तबका संख्या में विशाल हो गया है। 34 वर्ष बाद पश्चिम बंगाल को गंवाने पर वाम मोर्चा नेताओं की ये फ़ौरी प्रतिक्रियाएं रही हैं। आने वाले दिनों में उन्होंने हार के पोस्टमॉर्टम का वादा किया है, और स्पष्ट है कि उससे विचार के कुछ नए बिंदु सामने आएंगे। बहरहाल, वामपंथ से सहानुभूति रखने वाले कुछ अन्य बुद्धिजीवियों ने ज्यादा निर्ममता से हार की वजहों की तलाश की है। इसमें वाम मोर्चे- खासकर माकपा- के भीतर पैदा हुए अहंकार, कार्यकर्ताओं के राजनीतिक चरित्र में गिरावट, भाई-भतीजावाद और लोकतंत्र के बुनियादी सिद्धांतों की अवहेलना का बेलाग जिक्र किया गया है। कहा जा सकता है कि ये तमाम बातें उस लहर को बनाने में मददगार बनीं, जिससे लेफ्ट का लाल किला ढह गया।  

और इससे कई राजनीतिक समूहों की मुराद आखिरकार पूरी हुई। इन समूहों को हम मोटे तौर पर तीन खंडों में रखकर देख सकते हैं। पहला समूह दक्षिणपंथ का है, जिसकी तमन्ना है कि राजनीति में लेफ्ट कोई ताकत ही ना रहे, ताकि राज्य-व्यवस्था एवं उसकी आर्थिक नीतियों को नव-उदारवाद के ढांचे में निर्बाध ढाला जा सके। दूसरा हिस्सा चरम वामपंथी समूहों का है, जिनकी समझ है कि अगर संसदीय राजनीति में संगठित वामपंथ की उपस्थिति खत्म हो जाए, तो फिर वामपंथ के पूरे फलक पर वे खुद को फैला सकते हैं। तीसरा खंड अपने को जन आंदोलन और सिविल सोसायटी कहने वाले समूहों का है, जिन्हें लगता है कि संगठित एवं संसदीय लेफ्ट की अनुपस्थिति में वे एक नए लेफ्ट का निर्माण कर सकते हैं और इस तरह अभी की हाशिये पर की अपनी हैसियत से उभर कर एक नई राजनीतिक प्रासंगिकता प्राप्त कर सकते हैं। 

लेकिन मौजूदा परिस्थितियों में हाल के विधानसभा चुनाव नतीजों से उपरोक्त तीनों समूहों में से अगर किसी की हसरत सचमुच पूरी हो सकती है, वह सिर्फ पहला खंड- यानी दक्षिणपंथ है। यह हकीकत है कि पश्चिम बंगाल में लाल किला ढहने के बाद भारतीय राजनीति में नव-उदारवाद के प्रतिरोध में खड़ा वैकल्पिक ध्रुव काफी कमजोर हो गया है। अगर यह घटनाक्रम इसी रूप में आगे बढ़ा, तो देश में लोकतंत्र की जड़ें गहरी होने की प्रक्रिया पर यह जोरदार चोट होगी। इसलिए कि नए लेफ्ट के रूप में उभरने की महत्त्वाकांक्षा रखने वाले बाकी दोनों समूहों के पास वैसी राजनीति और दृष्टि नहीं है, जो व्यवस्था में आम आदमी की भागीदारी को नियंत्रित करने की परिघटनाओं को रोक सके। संगठन शक्ति तो बिल्कुल ही नहीं है।

मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व वाला वाम मोर्चा लंबे समय तक ऐसे मंसूबों के आगे अवरोध बना रहा, तो इसलिए कि पश्चिम बंगाल में उसके पास अभेद्य दिखने वाला किला था, जिसे केंद्र में रखकर वह अपनी राष्ट्रीय भूमिका को स्वरूप दे पाता था। पश्चिम बंगाल के साथ केरल और त्रिपुरा की ताकत इस भूमिका को इतनी महत्त्वपूर्ण बनाती थी कि बाकी राजनीति उसकी अनदेखी नहीं कर पाती थी। लेकिन अब यह स्थिति बन गई है। सवाल है कि आखिर पश्चिम बंगाल के इस किले में सेंध क्यों लगी? कैडर राज, व्यवस्था से असंतोष, पार्टी के सियासी चरित्र में गिरावट आदि बातें भले एक हद तक सही हों, परंतु वो बुनियादी कारण नहीं हैं। अगर हम- पिछले दो दशकों और खासकर पिछले पांच साल की चर्चाओं एवं घटनाओं पर गौर करें तो स्पष्ट यह होता है कि इसकी बुनियादी वजह वाम मोर्चे की विकास नीति संबंधी उलझन रही है। वाम मोर्चा सरकार ने पश्चिम बंगाल में भूमि सुधार और पंचायती राज के जरिए सत्ता के विकेंद्रीकरण जैसी ऐतिहासिक उपलब्धियां हासिल की थीं। राज्य में विकास एवं प्रगति को नई जमीन देने में इन कदमों की उल्लेखनीय भूमिका रही। मगर गुजरते वक्त के साथ मुद्दा यह उठा कि इसके आगे क्या? आखिर बढ़ती आबादी की जरूरत और न्यूनतम जायदाद हासिल होने के बाद खेतिहर समुदाय बढ़ी आकांक्षाओं को कैसे पूरा किया जाए? रोजगार के नए स्रोत कहां ढूंढे जाएं? लेफ्ट के लाल झंडे की वजह से पूंजीपति बंगाल छोड़ गए थे। भारतीय राज्य-व्यवस्था में राज्य सरकारों के पास उद्योग धंधे लगाने की उतनी पूंजी नहीं होती, जिससे वह सार्वजनिक क्षेत्र का दायरा एक सीमा से ज्यादा फैला सकें। 1990-2000 के दशकों में आकर यह सवाल निर्णायक महत्त्व का हो गया। तो वाम मोर्चे ने पूंजीपतियों को बुलाकर औद्योगिक विकास की नीति अपनाई।

अब यह इतिहास का हिस्सा है कि यह कैसे नीति बैकफायर कर गई। इसकी परिणति उस सामाजिक गठबंधन के उभरने के रूप में हुई, जिसकी प्रतीक ममता बनर्जी बनीं और जिसने आखिरकार 34 साल पुराना लाल किला ध्वस्त कर दिया। मगर यह सवाल अपनी जगह कायम है कि आखिर पश्चिम बंगाल, और प्रकारांतर में किसी अन्य राज्य या समाज का विकास होना चाहिए या नहीं और अगर विकास होना है, तो उसका रास्ता क्या है? यह बिल्कुल ठीक बात है कि बुद्धदेब भट्टाचार्जी के शासनकाल में पूंजीपतियों को लुभाने की ललक इतनी जगी कि वाम मोर्चा सरकार उन्हें जरूरत से भी ज्यादा की पेशकश करती दिखने लगी।

कुछ जानकारों ने ध्यान दिलाया है कि केरल की वीएस अच्युतानंदन सरकार ने पश्चिम बंगाल से अलग विकास नीति अपनाई। इस नीति के तहत किसानों को कर्ज राहत पहुंचाई गई, राज्य में बाहर से मजदूरों के लिए कल्याण योजनाएं शुरू की गईं, सार्वजनिक कारखानों की सेहत सुधारी गई और यहां तक कि कुछ बीमार निजी कारणों को सार्वजनिक क्षेत्र में लाया गया, शिक्षा और स्वास्थ्य पर खर्च बढ़ाया गया और सार्वजनिक वितरण प्रणाली को दुरुस्त किया गया। इन तमाम कदमों को कुशलता से लागू करने का परिणाम यह हुआ कि न सिर्फ बिना निजी पूंजी को बुलाए राज्य के विकास को नई दिशा मिली, बल्कि उसके परिणास्वरूप राज्य की राजकोषीय सेहत भी बेहतर हुई और राज्य के आर्थिक विकास की दर में भारी सुधार हुआ। माना जा सकता है कि इस विकास नीति का परिणाम वाम लोकतांत्रिक मोर्चे की उस ताकत के रूप में दिखा, जिसकी वजह से चुनाव में वह सिर्फ मामूली अंतर से ही पिछड़ा।

ये दोनों अनुभव अब गंभीर अध्ययन का विषय हैं, क्योंकि देश में संगठित लेफ्ट का क्या भविष्य है, यह अब उसके द्वारा पेश की जाने वाली विकास नीति से ही तय होगा। यहां यह गौरतलब है कि बुद्धदेब भट्टाचार्जी की सरकार जिस समय टाटा और इंडोनेशिया के सलीम ग्रुप जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनियों को बुलाने में अति उत्साह दिखा रही थी, उसी वक्त उसने मध्यम एवं छोटे उद्योगों का राज्य में जाल बिछाने का प्रशंसनीय कार्य भी किया। इस पहल की वजह से, भारतीय रिजर्व बैंक के आंकड़ों के मुताबिक, पश्चिम बंगाल देश में औद्योगिक विकास के लिहाज से चौथे नंबर पर पहुंच गया। राज्य में गरीबी मिटाने, और स्वास्थ्य एवं प्राथमिक शिक्षा के क्षेत्र की सफलताएं इससे अलग हैं, जो विकास के नए पैमानों में आज कहीं ज्यादा महत्त्व रखती हैं।

मगर बड़ी एवं बहुराष्ट्रीय पूंजी को बुलाने और उसके लिए किसानों की जमीन के अधिग्रहण की नीति ने वाम राजनीति, उसकी नई दिशा और भविष्य को लेकर ऐसा द्वंद्व खड़ा किया, जिसका जवाब वाम मोर्चा नहीं ढूंढ पाया। मुसीबत यह है कि इस विभ्रम पर ज्यादा तीखे सवाल मोर्चे के समर्थकों की तरफ से उठाए गए और उन पर मोर्चा नेताओं की प्रतिक्रिया टाल-मटोल वाली रही है। यह आलोचना वाजिब है कि एक स्तर तक विकास प्रक्रिया का नेतृत्व करने के बाद वाम मोर्चा विकास के अगले चरण का कोई अलग मॉडल पेश नहीं कर पाया। बल्कि एक मौके पर आकर उसने कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी जैसे नव-उदारवादी मॉडल को स्वीकार कर लिया। इससे उसके अपने समर्थक समूहों में ना सिर्फ भ्रम, बल्कि गुस्सा भी पैदा हुआ। इसकी कीमत उसे चुकानी पड़ी है।

अब वाम मोर्चे को अपनी खोयी जमीन वापस पानी है। वह सिर्फ ममता बनर्जी की संभावित गलतियों और उनकी सरकार द्वारा लेफ्ट के प्रगतिशील एजेंडे को पलटने से पैदा होने वाली राजनीतिक परिस्थितियों के भरोसे बैठा नहीं रह सकता। बल्कि उसको विकास नीति से जुड़े सवालों से सीधे टकराना होगा। इसी संदर्भ में भाकपा नेता एबी बर्धन की मध्य वर्ग से लेफ्ट के संवाद की बात महत्त्वपूर्ण हो जाती है। सवाल है कि क्या लेफ्ट विकास की एक ऐसी नीति और उसका सुविचारित कार्यक्रम पेश करने में सक्षम है, जिसमें मेहनतकश से लेकर मध्य वर्ग तक अपना हित देख सकें? 

यह बहुत बड़ी चुनौती है, लेकिन तथ्य यही है कि इस चुनौती को स्वीकार कर सकने की क्षमता सिर्फ संगठित वामपंथ में ही है। मोर्चे को इस बात का श्रेय है कि उसने अतीत में वस्तुगत परिस्थितियों के मुताबिक विकास एवं प्रगति की नीतियां बनाईं और उन पर अमल किया है। इसमें कमियां रही हैं, और जैसाकि ऊपर के विमर्श से जाहिर है उसने गलतियां भी की हैं। मगर हम सभी जानते हैं कि कोशिश और गलती सीखने की प्रक्रिया का अनिवार्य हिस्सा हैं। मानव इतिहास में इनसे कोई बच नहीं पाता है। सकारात्मक बात यह है कि हाल के झटकों के बावजूद वाम मोर्चे के साथ एक बड़ा जनाधार है। यह जनाधार लोकतांत्रिक राजनीति से बनाया गया है। नेताओं की व्यक्तिगत ईमानदारी और विचारधारा आधारित राजनीतिक संस्कृति आज भी वामपंथी दलों की एक अतिरिक्त थाती है। बल्कि अब तो यह एक अनोखी राजनीतिक पूंजी बन गई है। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या माकपा और अन्य वामपंथी दलों के नेताओं में कुछ नया सोचने और विकास का नया मॉडल देश के सामने रखने की क्षमता और इच्छाशक्ति है? यह प्रश्न न सिर्फ इन दलों, बल्कि इस देश के व्यापक जनतांत्रिक समूहों के लिए भी आज लगभग निर्णायक महत्त्व का हो गया है, क्योंकि इसके बिना पूरे देश में प्रासंगिक वामपंथ के उदय की संभावना न्यूनतम है। अगर ममता बनर्जी की संभावित विफलताओं और केरल में सत्ता परिवर्तन के क्रम के तहत वाम दल पांच साल बाद फिर से सत्ता में आ जाएं, तब भी बिना नया एजेंडा पेश किए उन्हें वह प्रासंगिकता हासिल नहीं हो सकती, जिससे वे देश में एक मजबूत विकल्प के रूप में उभर सकें।

भारत लोकतांत्रिक प्रयोग और अपनी संवैधानिक व्यवस्था को कार्यरूप देने के जिस मुकाम पर है, उसके बीच देश के समग्र विकास की वैकल्पिक समझ और उसकी रूपरेखा की जरूरत लगातार बढ़ती जा रही है। इसीलिए सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृद्धि दर से अलग विकास की आधुनिक अवधारणाओं पर आधारित एक राजनीतिक कार्यक्रम के रूप में पेश करने की चुनौती देश की वामपंथी ताकतों के सामने है। अगर वाम मोर्चा इस जरूरत को पूरा कर सकता है, तो वह न सिर्फ प्रासंगिक बना रहेगा, बल्कि उसका भविष्य उज्ज्वल भी है। वरना, धुर वामपंथ एवं कथित सिविल सोसायटी की मदद से दक्षिणपंथ के निर्बाध आगे बढ़ने का रास्ता फिलहाल तो सुगम हो गया है।  

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