सत्येंद्र रंजन
चुनाव नतीजों का अनुमान लगाना हमेशा जोखिम भरा होता है। लेकिन पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव पर मीडिया और अनेक राजनीतिक हलकों में जारी चर्चाओं पर गौर करें, तो यही अनुमान उभरता है कि 34 साल पुराना ‘लाल किला’ वहां ढहने वाला है। अगले शुक्रवार को नतीजे अगर इसी अनुमान के मुताबिक आए, तो यह खबर कई खेमों में जश्न का पैगाम लेकर आएगी। धुर दक्षिणपंथ से धुर वामपंथ तक में ऐसे जश्न के लिए लंबे समय से तैयारी है। वैसे दिल्ली विधानसभा के पिछले चुनाव जैसी मिसालों की भी कोई कमी नहीं है, जब शीला दीक्षित के नेतृत्व में कांग्रेस ने आम अनुमानों को झुठला दिया था। बहरहाल, अगर आम अनुमान ही सच हुए, तो आखिर तेरह मई के बाद देश की राजनीति कैसी होगी?
यह अंदाजा हम बेहतर ढंग से लगा सकते हैं, अगर पहले इस बात पर गौर कर लें कि मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व वाले वाम मोर्चे की पिछले तीन दशकों से देश में क्या भूमिका रही है? और अगर हम आज के राजनीतिक परिदृश्य पर एक नजर डाल लें, तो यह काम शायद और आसान हो सकता है। अगर आज की संसदीय संरचना पर गौर करें, तो संसद और विभिन्न विधानसभाएं नव-उदारवादी आर्थिक नीतियों पर लगभग पूरी राजनीतिक सहमति का मंच नजर आती हैं। कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी में भारतीय राष्ट्रवाद के अन्य आधार मूल्यों पर चाहे जैसी असहमति हो, आर्थिक नीतियों पर कोई असहमति नहीं है। इसका प्रतिफलन उनकी विदेश नीतियों पर भी देखा जा सकता है। एक दूसरी हकीकत यह है कि राष्ट्रीय स्तर पर पूरी सियासत इन्हीं दोनों पार्टियों कि धुरी पर गोलबंद है। जिन क्षेत्रीय या अन्य सामाजिक-राजनीतिक पृष्ठभूमियों से उभरे दलों से कभी लोकतंत्र एवं संघवाद की जड़ों को गहरा बनाने की उम्मीद जोड़ी गई थी, वे आज अपना अलग राजनीतिक परिप्रेक्ष्य लगभग पूरी तरह गवां चुके हैं और अपनी राजनीति को उन्होंने इस या उस धुरी से जोड़ लिया है। इन सबको जोड़ने वाला सबसे मजबूत पहलू क्रोनी कैपिटलिज्म (यारी-नातेदारी का पूंजीवाद) का है, जिसके सूत्रधार राजनीति के दायरे से अलग बैठे हैं, लेकिन जो अपनी धन की ताकत से राजनीति की दिशा और स्वरूप को तय कर रहे हैं।
इन परिघटनाओं ने पूरे देश में राजनीति को लगभग समरूप बना दिया है। आर्थिक मुद्दों या मुक्ति की भावना से प्रेरित सामाजिक-सांस्कृतिक मुद्दों पर गोलबंदी से बहुमत जुटाने की बातें चुनावों के वक्त भले कहीं-कहीं सुनने को मिल जाती हों, लेकिन यथार्थ में राजनीति की संचालक विचारधारा नव-उदारवाद है। इसके तहत विकास का जो मतलब है, उस पर इस पूरे राजनीतिक परिदृश्य में सहमति नजर आती है। इसके बीच क्षेपक सिर्फ वाम मोर्चा रहा है। यह ठीक है कि पश्चिम बंगाल में भूमि सुधार और पंचायती राज जैसे कार्यक्रम पर अमल के बाद राज्य के विकास की नीति को आगे बढ़ाने के सवाल पर यह मोर्चा भी भ्रम और दिग्भ्रम का शिकार हुआ। उसकी कुछ पहल नव-उदारवाद को स्वीकार करने की हद तक जाती दिखी। मगर ऐसे भ्रम आज सारी दुनिया के सामने हैं। विकास नीति की जो मुख्यधारा है, उसका स्पष्ट और सुपरिभाषित विकल्प किसी विचारधारा या राजनीतिक शक्ति के पास है, उसका प्रमाण कम से कम व्यावहारिक एवं प्रयोगात्मक स्तर पर सार्वजनिक दायरे में मौजूद नहीं है।
बहरहाल, वाम मोर्चे की संपूर्ण पहचान उपरोक्त कुछ भ्रम या दिग्भ्रम नहीं हैं। उसकी पहचान नव-उदारवाद एवं सांप्रदायिकता की लगातार आलोचना पेश करना और उसके आधार पर राजनीतिक ध्रुवीकरण की कोशिश रही है। इस क्रम में मोर्चे ने “सहयोग एवं संघर्ष” को साथ-साथ चलाने की रणनीति पर अक्सर कारगर अमल किया। अपने शासन वाले राज्यों में भी उसका चरित्र पूरी तरह अन्य पार्टियों की तरह रहा, यह बात बारीकियों और वस्तुगत स्थितियों के फर्क को नजरअंदाज कर ही कही जा सकती है। यह बात स्वीकार करने में किसी को हिचक नहीं होनी चाहिए कि वाम मोर्चा की सरकारें शासन की वैकल्पिक शैली का विकास करने में असफल रहीं, मगर उन्होंने मात्रात्मक या गुणात्मक कोई अलग शैली नहीं अपनाई, यह सिर्फ तथ्यों के प्रति अपमान-भाव के साथ ही कहा जा सकता है।
दरअसल, राजनीति की आम मुख्यधारा से अलग समझ, चरित्र और अभियान की बदौलत ही वाम मोर्चे ने राष्ट्रीय राजनीति अपनी एक अलग भूमिका बनाई, जो पिछले लोकसभा चुनाव में लगे झटकों के बाद कमजोर हो गई है। स्पष्ट है, उस हार के लिए वाम मोर्चा किसी और को जिम्मेदार नहीं ठहरा सकता। ना ही तेरह मई को अगर सचमुच उसका “लाल किला” ढह जाता है, तो उसके लिए किसी और को दोषी माना जा सकता है। यह जिम्मेदारी उसके वर्तमान नेतृत्व को स्वीकार करनी होगी। मगर उसका व्यावहारिक परिणाम यह होगा कि क्रोनी कैपिटलिज्म के नंगे नाच, नव-उदारवाद की व्यापक राजनीतिक स्वीकार्यर्ता और सांप्रदायिकता के उभार की लगातार मौजूद आशंकाओं के खिलाफ संघर्ष को गहरा झटका लगेगा एवं उसकी संभावनाएं निकट भविष्य में और कमजोर हो जाएंगी।
यह भ्रम रखना कि यह काम “नव-वामपंथ” करेगा, एक छलावे से ज्यादा कुछ नहीं है, क्योंकि ऐसी किसी सियासी ताकत का आज वजूद नहीं है। जन आंदोलनों और सिविल सोसायटी के नाम पर जो कुछ समूह हैं, उनके पास कोई राजनीतिक दृष्टि या राजनीति नहीं है। जिन लोगों को माओवाद जैसे चरम-वामपंथ में उम्मीद नजर आती हो, उनकी बात अलग है, क्योंकि समाज के विकास-क्रम, वस्तुगत स्थिति और मानव चेतना के स्तर से नावाकिफ रहकर रूमानी बने रहने से कोई किसी रोक नहीं सकता। बहरहाल, क्रोनी कैपिटलिज्म और नव-उदारवाद की ताकतों के साथ ऐसे कथित नव-वामपंथीं जमातों में एक जैसा ही जश्न शुक्रवार को देखते ही बनेगा, बशर्ते उनकी इच्छाओं से प्रेरित उनके अनुमान उस रोज सच हो गए!
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