सत्येंद्र रंजन
क्या बलात्कारियों को बधिया कर दिया जाना चाहिए? दिल्ली की अतिरिक्त सेशन जज कामिनी लाउ का यही सुझाव है। उन्होंने न सिर्फ ऐसी सजा के पक्ष में अंतरराष्ट्रीय उदाहरणों का जिक्र करते हुए तर्क दिए हैं, बल्कि इसकी विधियां भी बताई हैं। कई देशों में कुछ खास स्थितियों बलात्कार के अपराधी की शारीरिक ऑपरेशन या दवाओं के जरिए यौन क्षमता छीन ली जाती है। मसलन, अमेरिका के कुछ राज्यों में ऐसा दूसरी बार यह अपराध करने पर किया जाता है, जबकि कुछ राज्यों में अपराधियों के सामने यह विकल्प होता है कि अगर वे चाहें तो ऑपरेशन करवा कर या ऐसी दवा खाकर अपनी सजा कम करवा लें। यही प्रावधान स्वीडन, डेनमार्क और कनाडा जैसे देशों में भी हैं। इस ऑपरेशन या ऐसी दवाओं का असर यह होता है कि यौन भावनाएं भड़काने वाले हारमोन का शरीर में बनना कम या खत्म हो जाता है। लेकिन ऐसी सजा में समाधान के देखने के पीछे यह दृष्टि जरूर काम करती है कि अपराध के पीछे कोई सामाजिक या सांस्कृतिक वजह नहीं है, यह सिर्फ व्यक्ति की अपनी विकृति का परिणाम है। जबकि अनेक अध्ययन यह साबित कर चुके हैं कि बलात्कार के पीछे असली वजह स्त्री को भोग की वस्तु मानने और उसके स्वंतत्र अस्तित्व एवं स्वायत्त व्यक्तित्व से इनकार की मानसिकता प्रमुख होती है।
इसीलिए जज कामिनी लाउ का यह अनुमान बिल्कुल ठीक है कि बलात्कारियों के बधियाकरण के उनके सुझाव का समाज के एक हिस्से की तरफ से कड़ा विरोध किया जाएगा। कामिनी लाउ ने उस हिस्से की पहचान भी की है और अधिकार कार्यकर्ताओं की तरफ इशारा किया है। बहरहाल, यह सुझाव जिस घटना पर फैसला देते हुए दिया गया, वह हृदयविदारक है। उस घटना में एक व्यक्ति ने उस महिला से शादी की जिसकी पहली शादी से पांच संतानें थीं। उनमें बड़ी संतान लड़की थी, जिसके ग्यारह वर्ष की उम्र के हो जाने के बाद उस व्यक्ति ने चार साल में चार बार बलात्कार किए। लड़की की मां द्वारा विरोध किए जाने पर उसे मारपीट कर घर से भगा दिया। ऐसे हिंसक एवं बलात्कारी शख्स के प्रति चरम आक्रोश अस्वाभाविक नहीं है।
जाहिर है, ऐसे मामलों में अपराधी को कठोरतम सजा देने की भावना का एक संदर्भ है। लेकिन यह संदर्भ किसी सभ्य समाज एवं विकसित न्याय व्यवस्था में अपराध और सज़ा के मकसद के कुल संदर्भ से अलग नहीं हो सकता। गौरतलब है कि जज कामिनी लाउ ने यह सुझाव महज फ़ौरी प्रतिक्रिया के रूप में नहीं दिया है। बल्कि यह एक सुविचारित सिफारिश है। उन्होंने इसके पक्ष में न सिर्फ उन्होंने अंतरराष्ट्रीय अनुभवों का जिक्र करते हुए तर्क दिए हैं, बल्कि उन्होंने इस सुझाव को विचार के लिए केंद्रीय कानून एवं न्याय मंत्रालय को भेजने का आदेश भी दिया है।
बलात्कार एक जघन्य अपराध है और इसके अपराधी से किसी तरह की हमदर्दी निसंदेह किसी को नहीं होनी चाहिए। फिर भी यह प्रश्न प्रासंगिक है कि क्या बधियाकरण इस अपराध का सही समाधान है? इस सिलसिले में दो बातें ध्यान में रखने की हैं। पहली बात तो यह कि अगर अपने समाज में बहुत से बलात्कारी बगैर सजा पाए छूट जाते हैं, तो इसकी वजह यह नहीं है कि इस अपराध के लिए सजा का प्रावधान हलका है। इसकी वजह यह है कि अपनी आपराधिक न्याय व्यवस्था विभिन्न कानूनी पेचीदगियों और सामाजिक-सांस्कृतिक वजहों से अपराधियों के जुर्म साबित नहीं कर पाती। ऐसे में सजा चाहे फांसी हो या बधियाकरण- उसका प्रावधान कर दिए जाने से तस्वीर बदलने वाली नहीं है।
दूसरी बात ज्यादा बुनियादी है। आखिर एक सभ्य न्याय व्यवस्था में सजा का उद्देश्य क्या होना चाहिए? क्या प्रतिशोध या आक्रोश की भावना से दंड तय किए जाने चाहिए? या फिर सजा का मकसद अपराधी को पछतावे एवं सुधार का मौका देना है? प्रतिशोध की भावना संबंधित व्यक्ति के मूल रूप से बुरा होने की मान्यता से निकलती है, जिसे नृतत्व एवं समाजशास्त्रीय विकास-क्रम के ताजा स्तर पर पहुंचने के बाद स्वीकार नहीं किया जा सकता। अपने लंबे इतिहास में मानव समाज ने प्रतिशोध की भावना पर आधारित कठोर से कठोर सजाओं का तजुर्बे हासिल किए हैं। लेकिन अनुभव यही है कि आंख के बदले आंख या खून के बदले खून की सजाओं से अपराध खत्म नहीं किए जा सके। जाहिर है, बधियाकरण का प्रावधान भी बलात्कार को रोकने में अक्षम रहेगा।
बलात्कार को अगर सचमुच रोकना है, तो फ़ौरी तौर पर जहां आपराधिक न्याय प्रक्रिया को दुरुस्त किए जाने की जरूरत है, जिससे अपराधियों के जुर्म साबित करने की दर बढ़े, वहीं दीर्घकालिक तौर पर स्त्री के प्रति समाज का नजरिया बदलने की जरूरत है। जब तक स्त्री के आम एवं यौन व्यक्तित्व की समाज में पूरी स्वतंत्रता स्थापित नहीं होगी, बलात्कार की मानसिकता मौजूद रहेगी। स्पष्टतः इस मानसिकता को तोड़ना एक लंबी लड़ाई है, जिसमें कानून की सिर्फ मददगार भूमिका है।
सत्येंद्रजी
ReplyDeleteआपने ही यह माना की इस मानसिकता को तोड़ना एक लंबी लड़ाई है, जिसमें कानून की सिर्फ मददगार भूमिका है। और इसीलिए ही मेरा मानना है की बधियाकरण का प्रावधान बलात्कार को रोकने में भले अक्षम रहे फिर भी यह एक ऐसा जरिया है जो अन्य सजा से काफी मजबूत साबित हो सकता है. क्युकि सिर्फ यह सामाजिक प्रक्रिया है और कानून को प्रतिशोध या आक्रोश की भावना से दंड नहीं देना चाहिए साथ हमारी आपराधिक न्याय व्यवस्था विभिन्न कानूनी पेचीदगियों और सामाजिक-सांस्कृतिक वजहों से अपराधियों के जुर्म साबित नहीं कर पाती। इसलिए यह कारगर साबित नहीं होगा यह कितना तथ्य है ? और सभी केस में अपराधी को पछतावे एवं सुधार का मौका देना कितना उचित रहेगा ???
क्रिष्णा