सत्येंद्र रंजन
ओडीशा के धिंकिया और गोबिंदपुर गांवों में कानून के शासन और भारतीय लोकतंत्र में सबसे कमजोर तबकों से न्याय के वादों की परीक्षा थी। इन दोनों कसौटियों पर भारतीय राज्य-व्यवस्था फेल हुई है। केंद्र सरकार ने इस नाकामी पर संघीय व्यवस्था के सम्मान का मुलम्मा चढ़ाने की कोशिश की है, लेकिन उससे पोहान स्टील कंपनी (पोस्को) के साथ पक्षपात की सरकारी मंशा संभवतः छिपाई नहीं जा सकती है।
ओडीशा सरकार पोस्को और ऐसी तमाम परियोजनाओं के हक में उस हद खड़ी रही है कि उसे एक निष्पक्ष निर्णयकर्ता के बजाय एक पक्ष ही माना जा सकता है। नियमगिरि पहाड़ियों में वेदांता की परियोजना को रद्द करने के सवाल पर भी उसका यही रुख था। पोस्को के इस्पात कारखाना लगाने, बंदरगाह बनाने और इन दोनों को जोड़ने के लिए सड़क बनाने की परियोजना के रास्ते में किसी कानूनी, पर्यावरण संबंधी या जन अधिकारों का मामला ना आए, इसके लिए बीजू पटनायक की सरकार किसी भी हद तक जाने को तैयार रही है। जब केंद्र सरकार ने पर्यावरण नियमों एवं वन अधिकार कानून के उल्लंघन के आरोपों के आधार पर पिछले साल पोस्को परियोजना पर रोक लगाई, तब पटनायक सरकार ने उसका विरोध किया था। बाद में साठ अतिरिक्त शर्तों के साथ केंद्र सरकार ने परियोजना को हरी झंडी दी, लेकिन यह शर्त लगा दी कि इस पर अमल के क्रम में वन अधिकार कानून का उल्लंघन नहीं होना चाहिए।
धिंकिया और गोबिंदपुर गांवों की पल्ली (ग्राम) सभाओं ने वन अधिकार कानून के प्रावधानों के मुताबिक अपनी बैठक कर वहां की जमीन का आवंटन अन्य वनवासी समुदायों के बीच कर दिया। गौरतलब है कि ये दोनों गांव परियोजना के लिए जरूरी 1253 हेक्टयर जमीन के बीच में पड़ते हैं। अगर ये गांव अपनी जमीन नहीं देंगे तो बंदरगाह तक सड़क ले जाने के लिए बहुत लंबा मोड़ लेना पड़ेगा, जिससे परियोजना की लागत बढ़ेगी। इसलिए पोस्को कंपनी और राज्य सरकार दोनों धिंकिया और गोबिंदपुर गांवों की जमीन के अधिग्रहण पर आमादा रही हैं। वन अधिकार कानून के तहत ग्राम सभा गांव के संसाधनों के मामले में सर्वोच्च निकाय है और उसके फैसले को पलटा नहीं जा सकता। दोनों ग्राम सभाओं के फैसले के मद्देनजर केंद्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्री जयराम रमेश ने पिछले 14 अप्रैल को राज्य सरकार से कहा था कि वह दोनों गांवों के भूमि पर दावे को वन अधिकार कानून के तहत निपटाए।
राज्य सरकार ने इसका जवाब 29 अप्रैल को भेजा। इसमें दावा किया गया कि दोनों गांवों की ग्राम सभाओं की बैठक नियमों का उल्लंघन कर आयोजित की गई। राज्य सरकार ने दावा किया कि ओडीशा ग्राम पंचायत कानून, 1964 और वन अधिकार कानून 2006 के प्रावधानों के मुताबिक ग्राम सभा की बैठक आयोजित करने के लिए संबंधित सरकारी विभाग को पर्याप्त समय रहते सूचित नहीं किया गया और बैठक में मौजूद लोगों की संख्या तीन चौथाई आबादी से कम थी, जबकि कानून के प्रावधानों के मुताबिक कम से कम इतनी उपस्थिति होनी चाहिए। मगर पोस्को परियोजना का विरोध रहे स्थानीय लोगों के संगठन- पोस्को प्रतिरोध संग्राम समिति- का दावा है कि राज्य सरकार ने ग्राम सभाओं की बैठकों में मौजूद लोगों की संख्या को जानबूझ कर कम बताया। समिति के मुताबिक बैठक में दो हजार से ज्यादा लोग मौजूद थे और उनके दस्तखत उनके पास मौजूद हैं। लेकिन सरकार ने बैठक की कार्यवाही पुस्तिका के सिर्फ पहले पेज को स्कैन कर केंद्र को भेजा, जिस पर तकरीबन साठ लोगों के दस्तखत हैं।
केंद्र सरकार चाहती तो ओडीशा सरकार और पोस्को प्रतिरोध संग्राम समिति के दावों में अंतर की किसी स्वतंत्र कमेटी से जांच कराती। खासकर यह देखते हुए ऐसा करना उचित था, क्योंकि राज्य सरकार शुरू से एक पक्ष बनी हुई थी और अतीत में केंद्र सरकार की तीन समितियों ने पोस्को इलाके में वन अधिकार कानून एवं पर्यावरण कानून के उल्लंघन पुष्टि करते हुए केंद्र सरकार को अपनी रिपोर्ट दी थी। मगर केंद्र सरकार ने “सहयोगात्मक संघीय व्यवस्था” की दलील देते हुए ओडीशा सरकार की रिपोर्ट को स्वीकार कर लिया और पोस्को परियोजना को अंतिम हरी झंडी दे दी है। इस संदर्भ में जयराम रमेश का बयान गौरतलब है। उन्होंने कहा- “राज्य सरकार जो कहती है, उसमें आस्था और विश्वास सहयोगात्मक संघीय व्यवस्था का अनिवार्य स्तंभ है, इसीलिए मैंने दूसरे विकल्प को अस्वीकार कर दिया है। एक लोकतांत्रिक ढंग से चुनी गई सरकार के इरादे पर केंद्र सरकार एक हद से आगे जाते हुए हमेशा सवाल खड़े नहीं कर सकती।” इसके साथ ही रमेश ने एक विवादास्पद बात कही। कहा- वन अधिकार कानून पर अमल “एक सीखने और निरंतर विकसित होने वाली प्रक्रिया है।” इस पर पोस्को प्रतिरोध संग्राम समिति की टिप्पणी माकूल है- “हम ऐसी नई अवधारणा से परिचित नहीं हैं। एक कानून पर या तो अमल होता है, या नहीं होता है। उस पर अमल किए बिना वन भूमि पर कब्जे की अनुमति देना कानून के तहत एक अपराध है और अपराध एक सीखने और निरंतर विकसित होने वाली प्रक्रिया नहीं हो सकती।”
साफ है, 54 हजार करोड़ रुपए की परियोजना, जिसे देश में सबसे बड़ा प्रत्यक्ष विदेशी निवेश बताया गया है, वनवासी लोगों के हितों और कानूनी अधिकारों पर भारी पड़ी है। अपने लोकतंत्र का यह भी एक चेहरा है।
प्रिय सत्येन्द्र जी ,
ReplyDeleteआपका लेख पढ़ा जो की पोस्को के केंद्र सरकार द्वारा मंजूरी देने से सम्बंधित है और आपने लेटेस्ट महत्वपूर्ण जानकारी दी है,केंद्र सरकार किस प्रकार खेल खेलती है ,पहले कुछ और बाद में कुछ और , जय राम रमेश के तो क्या कहने अति उतम ,जहाँ पडला भरी दिखा वही कूद पड़े ,किस प्रकार केंद्र व राज्य सरकार वन अधिकार कानून व ग्राम सभा के कानूनों का उलंघन किया है ,इस तरह से ऐसा प्रतीत होता है सरकार को जो करना है वह तो वो करके ही है ,इसलिए सिविल सोसाइटी को निराशा होती है ,एंटी पोस्को संघर्ष समिति ने इतने वर्ष संघर्ष किया लेकिन अंत में क्या हुआ वही जो सरकार चाहती है ,फिर भी जनता को तो संघर्ष करना ही है , तब कवि सुरेन्द्र शर्मा की ये पंक्तिया याद आती है
"राज चाहें रावण का हो या राम का
जनता तो बेचारी सीता है ,रावण का राज हुआ तो हरण कर ली जायगी,
राम का हुआ तो अग्नि परीक्षा के बाद भी वन को भेजी जायगी
राज चाहें कोरवों का हो या पांडवों का
जनता तो बेचारी द्रोपदी है ,कोरव हुए तो चीर हरण की जाएगी और
पांडव हुए तो जुए में हरा दी जाएगी .
इसलिए केंद्र में कोंग्रेस हो या राज्य में बी जे ड़ी पोस्को को मंजूरी दे ही दी गई जनता तो प्रभावित हो रही है
प्रताप