सत्येंद्र रंजन
एक लोकप्रिय ग़जल की तर्ज पर भ्रष्टाचार की निकली बात अब दूर तक जा रही है। भ्रष्टाचार कोई नया मुद्दा नहीं है, लेकिन पिछले एक साल से खुलते गए बड़े घोटालों के साथ यह सार्वजनिक चर्चा के केंद्र में रहा है। बीते अप्रैल के पहले हफ्ते में जब अन्ना हजारे दिल्ली में जंतर-मंतर पर अनशन पर बैठे और कॉरपोरेट मीडिया की मदद से उसे मध्य वर्ग का जबरदस्त मिला, तब से इस पर खास चर्चा हो रही है। जंतर-मंतर के आंदोलन ने “भ्रष्ट नेताओं को गिद्धों को खिलाने” जैसे क्रूर बड़बोलेपन और “भ्रष्टाचारियों को फांसी देने” जैसी मांगों के साथ भ्रष्टाचार के सवाल पर शहरी अराजनीतिक तबकों की अपेक्षाओं को अव्यावहारिक ऊंचाई तक पहुंचा दिया। जबकि अनशन पर बैठे अन्ना की मांग लोकपाल की स्थापना तक सीमित थी। उनके पास ‘सिविल सोसायटी’ द्वारा तैयार ‘जन लोकपाल विधेयक’ का प्रारूप था और वे चाहते थे कि सरकार उसे स्वीकार कर ले। बहरहाल, लोकपाल की स्थापना के विधेयक को तैयार करने के लिए केंद्रीय मंत्रियों और ‘सिविल सोसायटी’ के सदस्यों की साझा समिति बनने के साथ अन्ना के आंदोलन का कम से कम जंतर-मंतर का चरण तो पूरा हो गया।
अन्ना के मंच पर विभिन्न समझ और आस्थाओं वाले लोग पहुंचे। उन्हें जोड़ने वाला एक ही पहलू था- भ्रष्टाचार का विरोध। वहां भ्रष्टाचार को लेकर गुस्सा दिखा और निशाने पर राजनेता और देश की प्रातिनिधिक राजनीतिक संस्थाएं थीं। सिर्फ सरकार और संसद के प्रति वहां अपमान का भाव नहीं था, बल्कि “संविधान को फाड़ डालने” जैसी बातें भी की गईं। जब तक अन्ना हजारे ने नरेंद्र मोदी की तारीफ नहीं कर दी, उनके इर्द-गिर्द जुटे धुर दक्षिणपंथी से धुर वामपंथी समूहों एवं लोगों में इस “आजादी के दूसरे आंदोलन” के परिप्रेक्ष्य एवं इसमें सहभागी लोगों के वर्ग-चरित्र एवं उद्देश्यों पर कोई सवाल नहीं उठाए गए। भ्रष्टाचार की एक साझा समझ पर वहां बाबा रामदेव और आरएसएस से लेकर सीपीआई- एमएल के कुछ गुटों के नेता एवं कार्यकर्ता सहमत थे। इनके बीच कथित जन आंदोलनों एवं ‘सिविल सोसायटी’ के प्रतिनिधि तो थे ही, जिनका फ्रीलांस एजेंडा पहले भी सवालों के घेरे में रहा है।
मगर भ्रष्टाचार की ऐसी व्याख्या की सुविधा ज्यादा समय तक नहीं टिकी। भारत जैसे क्रियाशील लोकतंत्र की यही विशेषता है कि इसमें किसी एजेंडे, विचार या कार्यक्रम पर किसी एक समूह का एकाधिकार बनाए रखना मुमकिन नहीं होता। तो अब भ्रष्टाचार के जंतर-मंतर वाले संस्करण पर विभिन्न खेमों से समीक्षा और आलोचना का दौर है। और नतीजा यह है कि जंतर-मंतर वाली ‘सिविल सोसायटी’ के प्रतिनिधि अपने रैडिकल साथियों के बीच में जाकर यह कहने लगे हैं कि 1991 से लागू हुई नई आर्थिक नीतियां ही विशुद्ध रूप से वो कारण हैं, जिनकी वजह से आज देश में भ्रष्टाचार इतना फैल गया है।
ये रैडिकल साथी जब दिल्ली में जुटे तो जंतर-मंतर की ‘जन क्रांति’ का पोस्टमार्टम हुआ। लेखिका अरुंधती राय के इन शब्दों पर गौर कीजिए- “अन्ना हजारे और उनकी टीम को समर्थन देने के लिए जंतर-मंतर पर जुटी लाखों लोगों की भीड़ के सामने, जिनका गुस्सा समझा जा सकता है, भ्रष्टाचार को एक नैतिक सवाल के रूप में पेश किया गया। इसे एक राजनीतिक या व्यवस्था से जुड़े प्रश्न के रूप में सामने नहीं रखा गया- इसे रोग के लक्षण के रूप में नहीं, बल्कि खुद के रोग के रूप में सामने रखा गया। जिस व्यवस्था की वजह से भ्रष्टाचार होता है, उसे बदलने या ध्वस्त करने की कोई अपील नहीं की गई। शायद इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है, क्योंकि जंतर-मंतर पर पहुंचे मध्य वर्ग के बहुत से लोग और वहां के जमावड़े के प्रसारण लिए पहुंचा कॉरपोरेट प्रायोजित मीडिया उन आर्थिक सुधारों से लाभ पाने वालों में रहे हैं, जिनके परिणामस्वरूप भ्रष्टाचार इस सीमा तक पहुंचा है। इन्हीं लोगों ने इसे ‘क्रांति’- भारत का तहरीर चौक- बताया। इसलिए इसमें कोई हैरत की बात नहीं है कि कई कॉरपोरेट सीईओज ने इस अभियान को उदारता से लाखों रुपए चंदे दिए, सेलफोन कंपनियों ने मुफ्त एसएमएस संदेश की सुविधाएं दीं- आखिर कॉरपोरेट सेक्टर एवं कॉरपोरेट मीडिया के पास अपनी सार्वजनिक छवि को सुधारने का एक मौका था, जो 2 जी स्पेक्ट्रम घोटाले के खबरों में आने के समय से खराब हो गई थी।” अरुंधती राय की यह टिप्पणी भी इस संदर्भ में ध्यान देने लायक है- “जब भ्रष्टाचार को अस्पष्ट और सतही रूप से एक नैतिक समस्या के रूप में देखा जाता है, तो हर कोई खुशी-खुशी उसके खिलाफ एकजुट होता जाता है। इनमें फासिस्ट, डेमोक्रेट, अराजकतावादी, भक्त बाबा, तफरी करने वाले, दक्षिणपंथी, वामपंथी और यहां तक कि घोर भ्रष्ट भी शामिल रहते हैं, जो शायद सबसे ज्यादा उत्साह से प्रदर्शन में हिस्सा लेते हैं।”
अब जंतर-मंतर की ‘क्रांति’ पर राष्ट्रीय सलाहकार परिषद की सदस्य और सिविल सोसायटी की एक प्रमुख नाम अरुणा राय के विचार सुनिए- “2007 में 25,000 आदिवासी भूमि विवादों को हल करने की मांग करने के लिए भोपाल से पैदल चलकर दिल्ली आए थे। तब कुछ ही (टीवी) कैमरा वहां पहुंचे। कोई सड़कों पर उनका स्वागत करने या समर्थन देने नहीं आया। आखिर वे सिविल सोसायटी नहीं थे, बल्कि गरीब मेहनतकश थे! ... एक दलित नेता ने कुछ दिन पहले जयपुर में एक जन सुनवाई के दौरान कहा कि घूस देने और लेने में मददगार मध्य वर्ग जंतर-मंतर पर हवन और भजन करके प्रायश्चित कर रहा है। लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व की मांग को लोकतांत्रिक व्यवहार की जिम्मेदारी से रू-ब-रू होना पड़ता है। सिविल सोसायटी एक बहुत कमजोर शब्द है, जो जितना कुछ बताता है, उससे ज्यादा छिपाता है। भारत जैसे देश में, जहां वर्ग एवं जाति जैसे इतने बुनियादी विभाजन हैं, वहां यह शब्द और भी कम उचित है।”
विडंबना यह है कि जंतर-मंतर की ‘क्रांति’ ने जहां एक तरफ भ्रष्टाचार की सतही समझ पेश की, वहीं उसने अभिजात्य और गैर-प्रातिनिधिक सिविल सोसायटी को सार्वजनिक चर्चाओं में प्रतिष्ठित बना दिया। वैसे यह प्रतिष्ठा तो ज्यादा टिकाऊ साबित नहीं हुई है, लेकिन इससे यह मौका हमें जरूर मिला है कि हम भारतीय सिविल सोसायटी के स्वरूप एवं चरित्र को अब बेहतर ढंग से समझ सकें। कहा जा सकता है कि गजल की पंक्ति- बात निकलेगी तो दूर तलक जाएगी- सिविल सोसायटी पर चर्चा के संदर्भ में भी सटीक बैठती है। अन्ना हजारे के अनशन के संदर्भ में यह शब्द जितना चर्चित हुआ है, भारत में शायद वैसा पहले कभी नहीं हुआ। इस क्रम में इस अवधारणा, सिविल सोसायटी की भूमिका और उसकी प्रासंगिकता को नए सिरे से समझने की कोशिश की गई है। इसी संदर्भ में इटली के मशहूर राजनीतिक चिंतक एंतोनियो ग्राम्स्की की उस समझ का हवाला दिया गया है, जिसके मुताबिक सिविल सोसायटी पूंजीवादी व्यवस्था का वह संवेदनशील वर्ग है, जिसे उत्पीड़ित तबकों द्वारा शासक वर्गों के प्रभुत्व को चुनौती देने के संघर्ष में सहायक बनाया जा सकता है। एक अन्य समझ के मुताबिक सिविल सोसायटी राज्य, बाजार एवं नागरिकों के बीच का वह सार्वजनिक दायरा है, जिसमें लोग बहस और पहल कर सकते हैं। जबकि सिविल सोसायटी की एक अपेक्षाकृत अधिक संकरी धारणा के मुताबिक यह शब्द राजकीय संस्थाओं से बाहर मौजूद सामाजिक ढांचों और हितों के लिए इस्तेमाल होता है।
दुनिया के जिन हिस्सों में प्रातिनिधिक जनतंत्र अपनी जड़ें जमा चुका है, वहां अब चुनौती यह है कि इस व्यवस्था को जन अपेक्षाओं के प्रति कैसे ज्यादा जवाबदेह बनाया जाए। इसके लिए नए तौर-तरीकों पर विचार हो रहा है। इसके बीच सिविल सोसायटी का हस्तक्षेप भी एक तरीका है और अगर यह एक निरंतर परिघटना के रूप में स्थापित हो जाए, तो संभवतः सरकारों एवं विधायिका को जन इच्छाओं की अभिव्यक्ति का बेहतर उपकरण बनाया जा सकता है। लेकिन यह गौरतलब है कि आखिर सिविल सोसायटी भी कोई निरपेक्ष चीज नहीं है, और जैसाकि अरुणा राय के उद्धरण से जाहिर है, उसे किसी समाज के खास संदर्भों एवं परिस्थितियों से काटकर नहीं देखा जा सकता।
अगर भारतीय संदर्भ में देखें तो सिविल सोसायटी के दायरे में आने वाले व्यक्तियों एवं संगठनों की मोटे तौर पर एक खास पहचान तलाशी जा सकती है। व्यक्तियों पर गौर करें, तो इनमें अक्सर उच्च मध्य एवं मध्य वर्ग के चेहरे नजर आएंगे, जो अपनी राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाएं चुनावी राजनीति में प्रत्यक्ष भागीदारी से पूरी करने में अक्षम रहते हैं। संगठनों के तौर पर इसमें ज्यादा उपस्थिति ऐसे समूहों की है, जिनकी पहचान ‘एनजीओ’ के रूप में की जा सकती है। ये व्यक्ति या संगठन किसी सुस्पष्ट विचारधारा, इतिहास दृष्टि या राजनीति की बात आम तौर पर नहीं करते और अधिकांशतः यह उनके पास होती भी नहीं है। वे कुछ प्रासंगिक मुद्दों को उठाते हैं, उनके प्रति समाज में समर्थन जुटाते हैं, और उससे अपनी एक सीमित भूमिका बनाते हैं। ये मुद्दे सकारात्मक से लेकर नकारात्मक और यहां तक कि विध्वंसात्मक भी हो सकते हैं।
अन्ना हजारे के समर्थन में निसंदेह भ्रष्टाचार एवं घोटालों के लगातार खुलासों से त्रस्त आम लोग- खासकर शहरी नौजवान जुटे, लेकिन उनके अभियान की केंद्रीय ताकत यही सिविल सोसायटी थी। मुद्दा भ्रष्टाचार था, जिसकी मार हम सबको झेलनी पड़ती है, लेकिन इस पर कोई ठोस या मूर्त राजनीतिक मांग पेश करना हमेशा कठिन रहा है। जेपी आंदोलन से लेकर वीपी सिंह के अभियान तक भ्रष्टाचार के नाम पर हंगामा तो खूब हुआ, लेकिन हंगामा मचाने वाले लोगों के हाथ में जब राजनीतिक सत्ता आई, तो सूरत बदलने की कोई पहल वे नहीं कर सके। इसकी वजह सिर्फ यह नहीं है कि उनमें इरादा नहीं था। बल्कि ज्यादा ठोस वजह यह है कि एक ऐसी बुराई, जो लगभग हर जगह फैली हो और जिसमें लगभग सभी लोग किसी ना किसी रूप में भागीदार हों, उसे जन-जागरूकता को बढ़ाते हुए और अवरोध एवं संतुलन की व्यवस्था को लगातार मजबूत करते हुए कम तो किया जा सकता है, लेकिन उसका कोई जादुई समाधान नहीं हो सकता।
ताजा प्रसंग में लोकपाल बिल को ऐसी जादुई मांग के रूप में पेश कर सिविल सोसायटी अपने अभियान के प्रति मध्य वर्ग में खासा समर्थन जुटाने में सफल रही है। मगर अपने जिस प्रारूप (कथित जन लोकपाल बिल) के आधार पर उसने इस मुद्दे पर एक तरह का चरमपंथी नजरिया पेश किया, उसे सरकार के साथ बनी ड्राफ्टिंग कमेटी की पहली बैठक से पहले उसे खुद ही बदलना पड़ा। इससे इस संदर्भ की व्यावहारिक सीमाएं साफ हो गई। अब सिविल सोसायटी के ज्यादा बड़े दायरे के साथ संवाद से यह भी साफ होता जा रहा है कि संभवतः न्यायपालिका प्रस्तावित लोकपाल के दायरे से बाहर रहेगी और यह भी मुमकिन है कि जन लोकपाल के समर्थक आखिरकार प्रधानमंत्री को भी उससे बाहर रखने पर सहमत हो जाएं।
सिविल सोसायटी के कथित प्रतिनिधियों रुख में यह बदलाव उनकी परिपक्वता को जाहिर करता है, मगर यहां प्रश्न जरूर प्रासंगिक है कि अव्यावहारिक बातों पर किसी आंदोलन के दौरान भावनाएं भड़काना आखिर कितना नैतिक एवं उचित है? यह व्यवहार उन नेताओं या राजनीतिक दलों से कैसे अलग है, जिन्हें “गिद्धों को खिलाने” की बात अन्ना हजारे के मंच से सुनी गई? और फिर ‘अपने’ लोगों के संपत्ति मोह, भ्रष्ट आचरण और अनियमितताओं का हर हाल में बचाव करने की मजबूरी राजनीतिक दलों के प्रवक्ताओं से किस अर्थ में अलग है?
फिलहाल मीडिया में मिल रहे महत्त्व से प्रफुल्लित सिविल सोसायटी का यह हिस्सा भले अभी यह महसूस ना करे, लेकिन इस व्यवहार से उसकी साख समाज के एक बड़े दायरे में संदिग्ध हो गई है। इतिहास दृष्टि के प्रति उपेक्षा-भाव, अयथार्थवादी सोच, अभिजात्यवादी एवं दक्षिणपंथी रुझानों, सांप्रदायिकता के प्रति नरमी, और सबसे ऊपर नैतिकता एवं शुचिता के प्रश्नों पर दोहरे मानदंडों ने उसके इरादों पर गहरे सवाल खड़े कर दिए हैं। और इस पृष्ठभूमि में यह प्रश्न उठा है कि क्या यह वही सिविल सोसायटी है, जिसकी परिकल्पना या व्याख्या एंतोनियो ग्राम्स्की ने की थी? या यह अगंभीर और बिना की किसी स्पष्ट उद्देश्य वाले वैसे लोगों की भीड़ है, जो जंतर-मंतर जैसी ‘क्रांति’ में अपनी व्यक्तिगत महत्त्वाकांक्षाओं को पूरा कर लेने का मौका देखते हैं?