सत्येंद्र रंजन
यूपीए सरकार ने वन और वनवासियों के लिए दो महत्त्वपूर्ण पहल की है। पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने राज्य सरकारों को एक पत्र लिखकर कहा कि वे बांस को लघु वन उपज घोषित कर दें। साथ ही केंद्रीय मंत्रिमंडल ने भारतीय वन कानून, 1927 में संशोधन के लिए पर्यावरण मंत्रालय की तरफ तैयार मसविदे को मंजूरी दे दी। यह संशोधन विधेयक अब संसद में पेश होगा। सरकार का कहना है कि इन दोनों कदमों से आदिवासियों एवं अन्य वनवासियों की आजीविका संबंधी समस्याएं हल होंगी और इनसे वन अधिकारियों के हाथों उनका उत्पीड़न रोकने में मदद मिलेगी।
वनवासियों को अपनी रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करने के लिए लघु वन उपज एक इस्तेमाल का कानूनी अधिकार है। बांस उनकी आजीविका का एक अहम स्रोत रहा है। मगर चूंकि यह लघु वन उपज के तहत नहीं आता है, इसलिए इसके उपयोग पर वन विभाग द्वारा उनके खिलाफ कार्रवाई करने और उन्हें परेशान करने की घटनाएं आम रही हैं। अब पर्यावरण मंत्रालय चाहता है कि वन अधिकार कानून के तहत जिन इलाकों में जंगल पर सामूहिक अधिकारों का निपटारा हो गया है, वहां ग्राम सभा बांस के बारे में सभी फैसले करे। उसे ट्रांजिट पास जारी करने का अधिकार हो और वही यह तय करे कि किस मात्रा में और किस तरह के बांस को काटा जाए। लेकिन इसके साथ यह शर्त जोड़ दी गई है कि ग्राम सभा को बांस की व्यापारिक खेती के लिए वन विभाग के साथ मिलकर प्रबंधन योजना बनानी होगी। फिर जिन इलाकों में अभी वन अधिकार कानून के तहत सामुदायिक अधिकारों पर अभी फैसला नहीं हुआ है, वहां स्थानीय समुदायों के साथ मिलकर वन विभाग यह तय करेगा कि बांस का टिकाऊ उपयोग कैसे हो और कितनी मात्रा में उसकी कटाई हो। गैर वन एवं निजी जमीन पर पैदा हुए बांस को लाने-ले जाने के लिए पास ग्राम सभा जारी करेगी।
राष्ट्रीय वन अधिकार कानून में संशोधन कर वन संबंधी छोटे अपराधों के मामलों में जुर्माने की रकम 50 रुपए से बढ़ाकर 10 हजार रुपए करने का प्रस्ताव है। सरकार का कहना है कि 1927 में तय हुई 50 रुपए की रकम आज कुछ भी नहीं है, इसलिए इस कानून के प्रावधानों को तोड़ना आसान हो गया है। इससे वन अधिकारियों को आदिवासियों को परेशान करने का मौका भी मिलता है, जो अपनी रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करने के लिए जंगलों में जाते हैं। अब कानून में नई धारा जोड़ी जाएगी, जिसके मुताबिक यह तय करने के पहले कि किसी व्यक्ति ने कानून तोड़ा है या नहीं, वन अधिकारियों को ग्राम सभा की राय लेनी होगी। सरकार का कहना है कि ग्राम सभा की पूरी भागीदारी से यह पहचान करना संभव हो जाएगा कि किसी व्यक्ति ने अनजाने में या वैध आजीविका पाने की कोशिश के दौरान कोई कानून तोड़ा है, या उसने जानबूझ कर अपराध किया है।
लेकिन ये प्रावधान सिविल सोसायटी को संतुष्ट करने में नाकाम हैं। सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि वन अपराधों एवं बांस दोनों ही मामलों में अनावश्यक रूप से वन विभाग को भूमिका दे दी गई है, जबकि पंचायती राज अनुसूचित क्षेत्र तक विस्तार कानून (पेसा) के तहत संविधान की पांचवीं अनुसूची में आने वाले इलाकों में जंगल एवं सामुदायिक संसाधनों के प्रबंधन का पूरा अधिकार ग्राम सभा का है। आदिवासियों एवं अन्य वनवासियों की आवाज उठाने वाले कार्यकर्ताओं की हमेशा ही यह समझ रही है कि वन विभाग वनवासियों का सबसे बड़ा शोषक है। वे जंगल के मामलों में वन विभाग की भूमिका पूरी तरह खत्म किए जाने की वकालत करते रहे हैं। नए संशोधनों के मामले में उनकी दलील है कि इनमें ग्राम सभा को मुख्य निर्णयकर्ता के बजाय महज परामर्शदाता बना दिया गया है। यह पेसा और वन अधिकार कानूनों का उल्लंघन है और साथ ही वन विभाग के वर्चस्व को जारी रखने का उपक्रम भी।
समस्या यह है कि वन विभाग अपनी औपनिवेशिक मानसिकता से आज तक बाहर नहीं निकला है। पेसा एवं वन अधिकार कानून बन जाने के बावजूद वन अधिकारी खुद को जंगल का मालिक और वनवासियों को जंगल में अतिक्रमणकारी मानते हैं। जब उनकी ऐसी सोच है, तब वे बांस या वन अपराधों के मामले में निर्णय की प्रक्रिया में ग्राम सभा या स्थानीय समुदायों की राय को कितनी अहमियत देंगे, यह समझा जा सकता है। इसलिए सिविल सोसायटी संगठनों की आशंका निराधार नहीं है। अब यह सरकार की जिम्मेदारी है कि वह जिनके हित में ताजा पहल करने की घोषणा कर रही है, उन समुदायों के बीच भरोसा पैदा करे। मगर, जब खुद सरकार के भीतर ऐसे मामलों पर गहरे मतभेद हों और प्रशासन के बड़े हिस्से की साख संदिग्ध हो, तब ऐसा करना आसान नहीं है।
Thanks sateyndra very good article
ReplyDeletethis article strengthen my perspective about the forest and its products.till 60 year after independence we are have same mentality toward the forest product and forest dweller.
Very good article
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