Thursday, March 24, 2011

पश्चिम बंगाल में क्या दांव पर है


सत्येंद्र रंजन

पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चे की हार की उम्मीद लिए तालियां बजाने के लिए बहुत से हाथ तैयार हैं। नहीं, हम पूंजीशाहों या कॉरपोरेट मीडिया की बात नहीं कर रहे हैं, जिनके एक नायक फिक्की के महासचिव अमित मित्रा को तृणमूल कांग्रेस अप्रैल-मई में होने वाले विधानसभा चुनाव में अपना उम्मीदवार बना रही है। यहां भारतीय जनता पार्टी भी हमारे ध्यान में नहीं है, जिसका लंबे समय से यह मंसूबा है कि किसी तरह अगर वाम मोर्चे को नष्ट कर दिया जाए, तो भारतीय राजनीति में तीसरे मोर्चे की संभावना हमेशा के लिए खत्म हो सकती है, और फिर कांग्रेस बनाम भाजपा की दो-ध्रुवीय राजनीति के लिए रास्ता साफ हो सकता है। राज्यसभा में पार्टी के नेता अरुण जेटली ऐसी ही संभावना जताते हुए कोलकाता में अभी कुछ रोज पहले भाषण दे आए हैं। कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस और भाजपा जैसी दक्षिणपंथी पार्टियों का ऐसी हसरत रखना वाजिब है और इसमें कोई दोमुंहापन नहीं है।

मगर हम यहां बात उन संगठनों, समूहों और कार्यकर्ताओं की कर रहे हैं, जो खुद को जनता के पक्ष में, जन-आंदोलनों के प्रतिनिधि और व्यापक सामाजिक-राजनीतिक परिवर्तन की ताकत बताते हैं। उन्हें वाम मोर्चे- खासकर मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी से कई शिकायतें हैं। मसलन, इस पार्टी का चरित्र बदल गया है। यह क्रांतिकारी नहीं रह गई है। उसने पश्चिम बंगाल में कैडर राज कायम कर रखा है, जिसे अब ममता बनर्जी और पी चिदंबरम से शब्द उधार लेते हुए हरमद (भाड़े के गुंडों) राज भी कहा जा रहा है। वाम मोर्चे ने पश्चिम बंगाल में लोकतंत्र का गला घोंट रखा है। इन सबसे मुक्ति के लिए जरूरी है कि वाम मोर्चे की हार हो। भले इसके लिए ममता बनर्जी का नेतृत्व ही क्यों स्वीकार ना करना पड़े! और भले उससे केंद्र की संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार के लिए अनुकूल स्थितियां ही क्यों पैदा ना हों, जिस पर वैसे ये कथित जन आंदोलनों के प्रतिनिधि नव-उदारवाद की राह पर चलने से लेकर देश को बेचने जैसे, ना जाने कैसे-कैसे बेशुमार आरोप लगाते हैं!

ममता बनर्जी के लिए जमीनी चुनावी समीकरणों में इन समूहों का शायद कोई महत्त्व नहीं है, क्योंकि इनकी मजबूत या महत्त्वपूर्ण हैसियत ना तो पश्चिम बंगाल में है, और ना ही देश के किसी अन्य इलाके में। मगर, उनका एक प्रचार मूल्य जरूर है, और इसकी अहमियत ममता बनर्जी निश्चित रूप से समझती हैं। वे जानती हैं कि उनके सामंती और अभिजात समर्थन आधार और तृणमूल कार्यकर्ताओं में असामाजिक तत्वों की भरमार के बावजूद आज अगर उनकी मुक्तिदाता की छवि बनी है, तो इसे बनाने में ऐसे बेज़मीन कार्यकर्ताओं एवं उन जैसे ही रुझान वाले बुद्धिजीवियों की बड़ी भूमिका है। दूसरे लोग भले भ्रम में हों, मगर ममता बनर्जी को तो शायद कोई भ्रम नहीं होगा कि वाम मोर्चे के खिलाफ लहर बनाने में, जिस नंदीग्राम की सबसे बड़ी भूमिका रही, वह असल में माओवादियों द्वारा संगठित आंदोलन था। उस गोलबंदी का नेतृत्व उनके हाथ में आया तो इसलिए कि एक खास बिंदु पर माओवादियों, फ्रीलांस जन-आंदोलन कार्यकर्ताओं- बुद्धिजीवियों और उनके बीच उद्देश्य की एकता बन गई।

यह उद्देश्य वाम मोर्चे का चौंतीस वर्ष पुराना किला तोड़ना है। हालांकि किसी चुनाव के पहले उसके नतीजों का अनुमान लगाना हमेशा जोखिम भरा होता है, फिर भी पिछले चार साल के रुझानों को देखते हुए यह आम धारणा बनी हुई है कि इस बार यह उद्देश्य पूरा हो सकता है। इसलिए यह इस वक्त एक महत्त्वपूर्ण विचारणीय मुद्दा है कि अगर ऐसा हुआ, तो उसके व्यापक परिणाम क्या होंगे? पश्चिम बंगाल में आखिर इस विधानसभा चुनाव में दांव पर क्या लगा है? माओवाद के समर्थक बुद्धिजीवियों को इस संभावित घटनाक्रम में माकपा से आगे जाकर एक नए वामपंथ की संभावना नजर आती है। फिलहाल, वे इस व्यापक वामपंथ में कथित जन आंदोलनों को भी शामिल करते हैं, हालांकि सोच की यह एकता कुछ कदमों से ज्यादा जारी रहेगी, इसकी कोई संभावना नहीं है। दूसरी तरफ माकपा के साथ रहे, लेकिन अब उससे खफा कुछ नेता और बुद्धिजीवी इस संभावित घटनाक्रम में माकपा एवं वाम मोर्चे के फिर से स्वच्छ होने की संभावना देखते हैं। उनकी राय है कि हार के बाद हरमद और सत्ता के लालच में पार्टी से जुड़े लोग अलग हो जाएंगे, जिसके बाद संभव है कि माकपा अपने पुराने वामपंथी चरित्र में फिर लौट आए।

चौंतीस वर्षों की सत्ता के दौरान माकपा में बड़ी संख्या में ऐसे लोग शामिल हो गए, जिनका मार्क्सवादी विचारधारा से कोई लेना-देना नहीं था, जिनका क्रांति या जनवाद से कभी कोई रिश्ता नहीं रहा, यह बात अब खुद माकपा मान चुकी है। पार्टी का दावा है कि मई 2009 के लोकसभा चुनाव में हार के बाद उसने खुद को स्वच्छ करने का व्यापक अभियान चलाया है, जिसके तहत करीब पैंतीस हजार लोग पार्टी से निकाले गए हैं। पार्टी पहले मशहूर नामों को टिकट देने के जिस भटकाव का शिकार हो गई थी, उससे भी उसने इस बार लौटने की कोशिश है, जब रिकॉर्ड संख्या में ऐसे नए सदस्यों को टिकट दिए गए हैं, जिन्हें पार्टी के निष्ठावान कार्यकर्ता बताया गया है। मगर यह सब पार्टी की लोकप्रियता वापस लाने के लिए पर्याप्त होगा, इस पर खुद माकपा नेतृत्व को भी भरोसा नहीं है। पार्टी नेता खुलेआम मानते हैं कि इस बार उनका कड़ा इम्तिहान है।

तो यह संभव है कि सिर्फ दो महीने बाद देश के सिर्फ एक राज्य (त्रिपुरा) में वामपंथी सरकार रह जाए, क्योंकि केरल में भी वाम लोकतांत्रिक मोर्चा भुरभरी जमीन पर है। अब विचारणीय प्रश्न यह है कि अगर ऐसा हुआ, तो यह देश की आम जनता और वामपंथी धारा के लिए अच्छी बात होगी या बुरी? इस सवाल पर विचार करने का एक नजरिया उन कथित जन-पक्षीय समूहों एवं संगठनों का है, जिन्हें ममता बनर्जी में मुक्ति नजर आती है। लेकिन यह नजरिया राजनीतिक विश्लेषण पर कम, अपनी मनोगत धारणाओं पर ज्यादा खड़ा है। बल्कि कह सकते हैं कि राजनीतिक से ज्यादा यह एक मनोवैज्ञानिक नजरिया है। ऐसा मनोविज्ञान अपनी सियासी जमीन ना होने, हम जैसा होना चाहते हैं, वैसा ना हो सकने से उत्पन्न ईर्ष्या-भाव और सोच के दड़बों में बंद हो जाने का परिणाम होता है। अक्सर ऐसे मनोविज्ञान का लाभ उन समूहों या शक्तियों को मिलता है, जिनका विरोधी होने का दावा ऐसे समूह करते हैं।

बहरहाल, अगर हम देश के राजनीतिक, एवं जन चेतना के विकासक्रम की वर्तमान स्थिति के प्रति सचेत हों, और मौजूद राजनीतिक शक्तियों के वर्ग चरित्र एवं उनकी विचारधाराओं को ध्यान में ऱखें, तो एक बेहतर राजनीतिक रुख तय करने की स्थिति में हम हो सकते हैं। सिर्फ तभी हम यह समझने की स्थिति में हो सकते हैं कि वर्तमान के लिए क्या बेहतर है। और यह तो सामान्य समझ की बात है कि वर्तमान को नष्ट कर कोई अच्छा भविष्य नहीं बनाया जा सकता। भारत की आज की परिस्थिति में राजनीति का झुकाव सिरे से दक्षिणपंथ की ओर है। राष्ट्रीय स्तर पर फिलहाल सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस है, जिसका नव-उदारवादी एजेंडा और क्रोनी कैपिटलिज्म को आगे बढ़ाने में जिसकी भूमिका अब बेपर्द हो चुकी है। दूसरी पार्टी भाजपा है, जो उस सर्वसमावेशी, न्यायपरक राष्ट्रवाद को ही नहीं मानती, जो हमारे स्वतंत्रता आंदोलन की देन और अपने संविधान का आधार है। दक्षिणपंथ के साथ-साथ यह सांप्रदायिक राष्ट्रवाद की पार्टी है, जिसके सत्ता में आने का क्या मतलब होता है, छह साल के अनुभव से अब हम भलिभांति परिचित हैँ। एक समय विभिन्न क्षेत्रीय दलों के उभार से जनतंत्र की जड़ें गहरी होने की उम्मीद खूब बांधी गई थी। एक सीमा तक इन दलों ने ऐसी भूमिका निभाई भी। लेकिन उसके बाद उनका जो विकासक्रम है, उसमें आर्थिक मुद्दों पर उनका कांग्रेस या भाजपा से कोई अलगाव नहीं रह गया है। धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रवाद के मुद्दे पर भी उनकी कोई निष्ठा या रणनीति है, अब यह मानने का कोई आधार नहीं है। वर्ग चरित्र एवं राजनीतिक संस्कृति में भी के उन दो बड़े दलों की कार्बन-कॉपी बन गए हैं। इसलिए अरुण जेटली अगर वाम मोर्चे की हार के बाद तीसरे मोर्चे की भूमिका में स्थायी ह्रास की संभावना देखते हैं, तो इस बिंदु पर वे बिल्कुल गलत नहीं हैं।

इसलिए प्रश्न यह है कि आखिर हम क्या चाहते है? क्या मौजूदा संसदीय व्यवस्था के भीतर और आज की ठोस परिस्थितियों में वामपंथी एजेंडे के किसी दखल की सकारात्मक भूमिका को हम मानते हैं या नहीं? अगर मानते हैं, तो यह दखल देने की सबसे ज्यादा संभव स्थिति में कौन-सी पार्टी या मोर्चा है? अगर हमें पूरे संदर्भ या निरपेक्ष एवं आदर्श स्थितियों की कल्पना से नीचे का हर मुद्दा, हर एजेंडा निरर्थक लगता है, तब इस बहस का भी कोई मतलब नहीं है। लेकिन अगर उत्तरोत्तर लोकतंत्रीकरण एवं जनतंत्र में जन की भूमिका को लगातार मजबूत करना हमारा एजेंडा है, तो फिर हर चुनाव की तरह पश्चिम बंगाल का चुनाव भी हमारे लिए महत्त्वपूर्ण है और उसमें बहुत कुछ दांव पर लगा है।

सिर्फ वस्तुगत संदर्भों से नावाकिफ या पूर्वाग्रह से ग्रस्त कोई व्यक्ति ही राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सत्ता के दौर में सांप्रदायिकता विरोधी गोलबंदी में वाम मोर्चे की खास भूमिका से इनकार कर सकता है। और सिर्फ वही लोग इस बात से आंख मूंद सकते हैं कि संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन के पहले कार्यकाल में इस मोर्चे के राजनीतिक दबावों की वजह से सोशल डेमोक्रेसी के कुछ अहम मुद्दे राष्ट्रीय राजनीतिक एजेंडे पर आ सके थे। अगर यूपीए-एक और यूपीए-दो की दिशा और नीतियों में कोई फर्क नहीं कर पाता और उसकी वजहों को नहीं समझ पाता, यह उसकी समझ का ही फेर है। हालांकि इस लेख में उद्देश्य कहीं, किसी बिंदु पर माकपा या वाम मोर्चे का बचाव करने का नहीं है, फिर भी एक उद्धरण यहां माकूल रहेगा। मशहूर पत्रकार चो रामास्वामी राजग शासनकाल में तब की सरकार के करीबी थे और अपने दक्षिणपंथी विचारों को वे छिपाते नहीं हैं। मगर, तब दिल्ली के एक समारोह में उन्होंने कहा था कि आजकल ईमानदार नेता सिर्फ कम्युनिस्ट पार्टियों में पाए जाते हैं, हालांकि उनकी विचारधारा इतनी दोषपूर्ण है कि कंट्री कैननॉट बी लेफ्ट ऑन लेफ्ट, यानी देश को उन पर नहीं छोड़ा जा सकता।  

बहरहाल, वाम मोर्चे के नेता आज यह स्वीकार करते हैं कि पश्चिम बंगाल में उनकी हिली जमीन की वजह उनकी अपनी कमजोरियां हैं। ये कमजोरियां नीतियों में उभरीं और राजनीतिक चरित्र में भी। जाहिर है, अपनी कमियों और खामियों को जान लेना अपने फायदे में होता है। मगर वाम मोर्चे को अगले चुनाव में इस आत्म-मंथन का फायदा शायद नहीं मिले। ममता बनर्जी की सियासी गोलबंदी फिलहाल ताकतवर नजर आती है। मगर जनतांत्रिक शक्तियों के लिए सवाल सिर्फ किसी की हार या जीत का नहीं है। यह तो लोकतंत्र की प्रक्रिया का हिस्सा है। दरअसल, इतिहास के आगे बढ़ने के क्रम में वामपंथ या जनतंत्र को कभी झटके नहीं लगते हों या इसकी संभावना नहीं रहे, ऐसा नहीं होता। अगर वाम मोर्चा हार जाता है, तो यह इतिहास का अंत नहीं होगा। लेकिन इससे देश में पहले से ही कमजोर वामपंथी एजेंडों पर एक कड़ा प्रहार जरूर होगा। यह दक्षिणपंथ और कुछ संदर्भों में सांप्रदायिक-दक्षिणपंथ की जीत होगी। अब जो हाथ इस पर तालियां बजाने के लिए तैयार हैं, यह उनके सोचने की बात है कि वे किसके पक्ष में हैं? 

1 comment:

  1. good after noom
    satyendra ji
    aana ji ke lokpal bill wala article padha jankare badhi bhuth acha laga

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