सत्येंद्र रंजन
एक किताब पर फिर विवाद है और सरकारें उससे निपटने का फिर वही पुराना तरीका अपना रही हैं। ‘ग्रेट सोल: महात्मा गांधी एंड हिज स्ट्रगल विद इंडिया’ पर रोक के लिए गुजरात विधानसभा से सर्वसम्मत प्रस्ताव पास होने के बाद राज्य सरकार ने यह कदम उठाने का फैसला कर लिया है। महाराष्ट्र सरकार ऐसा इरादा जता चुकी है और केंद्रीय कानून मंत्री वीरप्पा मोइली ने भी ऐसे कदम पर विचार करने की बात कही है। सवाल है कि क्या यह सही प्रतिक्रिया है?
पहले थोड़ी बात संबंधित किताब की। लेलीवेल्ड की यह किताब गांधी की आलोचना में लिखी गई है। गांधीजी के पोते और कुछ वर्ष पहले खुद गांधीजी की जीवनी लिख चुके मशहूर विद्वान राजमोहन गांधी ने इस किताब के बारे में लिखा है- “जोसेफ लेलीवेल्ड गांधीजी की आलोचना न सिर्फ प्रत्यक्ष हमलों से बल्कि संहेद के अतिरेक से भी करते हैं। ऐसा लगता है कि उन्हें गांधी की हर बात पर संदेह है। जब कभी वे विरोधियों के साथ गांधीजी के संघर्ष की चर्चा करते हैं- चाहे वह तत्कालीन दक्षिण अफ्रीकी सरकार हो, भारत के ब्रिटिश शासक हों, जिन्ना, अंबेडकर, हिंदू उग्रवादी या कोई भी अन्य हो, वे हर मामले में संदेह का लाभ गांधी के विरोधी को देते हैं।”
राजमोहन गांधी आगे लिखते हैं, “अतः वे (लेलीवेल्ड) हिंदू चरमपंथी की यह धारणा स्वीकार कर लेते हैं कि गांधीजी की हत्या का फैसला 1948 में पाकिस्तान के लिए तय 55 करोड़ रुपए की रकम उसे देने पर गांधीजी के जोर डालने की वजह से किया गया, जबकि यह एक सुस्थापित तथ्य है कि यह मुद्दा उठने के काफी पहले साजिश रची जा चुकी थी। जो लोग यह मानना चाहते हैं कि गांधी दलितों के बरक्स जातिवादी थे, अफ्रीकी काले समुदाय के बरक्स नस्लवादी थे, या ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ एक हिंसक उग्रपंथी, मुस्लिम अधिकारों के विरोधी या मुसलमानों को तुष्ट करने वाले थे- उन सबको यहां अपने पक्ष में सामग्री मिल जाएगी।”
लेकिन ऐसे तमाम और तर्क और सामग्रियां पहले से सार्वजनिक दायरे में मौजूद हैं। तो फिर लेलीवेल्ड की किताब पर कोई बहुत ध्यान क्यों देता? तो उन्होंने संभवतः एक पुराना फॉर्मूला अपनाया है। महान शख्सियतों के यौन जीवन के बारे भड़काऊ बातें लिखना ऐसा एक फॉर्मूला रहा है। राजमोहन गांधी का कहना है- “लेलीवेल्ड बिना कोई प्रमाण दिए या अपना निष्कर्ष पेश किए, वक्रोक्ति में एक दक्षिण अफ्रीकी निकट दोस्त, जाने-माने यहूदी वास्तुकार, हरमन कालेनबैक के साथ गांधीजी के संभावित समलैंगिक संबंध की तरफ इशारा करते हैं।” जाहिर है, यह चर्चा चालाकी से की गई है, ताकि जब सवाल उठें तो उससे मुकरा जा सके। और लेलीवेल्ड ने अब यही किया है।
लेलीवेल्ड ने यह सफाई दी है कि उन्होंने गांधीजी की यौन प्राथमिकताओं के बारे में कुछ नहीं लिखा है, उन्होंने सिर्फ दक्षिण अफ्रीका प्रवास के दौरान हरमन कालेनबैक नाम के एक व्यक्ति के साथ गांधीजी के जटिल संबंधों पर रोशनी डाली है और गांधीजी द्वारा उन्हें लिखे गए पत्रों का हवाला दिया है। चूंकि ब्रिटिश अखबार डेली मेल के पुस्तक समीक्षक ने इसका अर्थ गांधीजी के समलैंगिक रूझान के रूप में निकाला और अखबार ने उसी को हेडिंग बना दिया, इसलिए यह सारा विवाद खड़ा हुआ है।
इस विवाद पर भारत में गुस्सा भड़का है, तो उसे अनुचित नहीं कहा जा सकता। मगर क्या ऐसे हर गुस्से की परिणति प्रतिबंध के रूप में होनी चाहिए? यहां ये बात ध्यान में रखने की है कि लेलीवेल्ड जैसे लेखक को आज अगर महात्मा गांधी पर किताब लिखने की जरूरत महसूस हुई, तो इसीलिए कि अपने जीवन एवं संदेशों की वजह से गांधीजी लगातार प्रासंगिक बने हुए हैं। ये संदेश सत्य और अहिंसा हैं। अपने बारे में हर सच गांधीजी ने खुद दुनिया के सामने रखा। और सच के आधार पर उन्होंने मावनीय स्वतंत्रता के लिए संघर्ष किया।
ऐसे व्यक्तित्व को कोई लांछन मलीन नहीं कर सकता और अगर वह सच ना हो, तो उसकी छाया तक नहीं टिक सकती। फिर इतना हाय-तौबा क्यों?
हमें यह ध्यान में रखना चाहिए कि किताब या किसी बौद्धिक या कला कर्म पर प्रतिबंध की बात एक भटकी हुई मांग है। इससे कुछ हासिल नहीं होता। साथ ही विचार पर प्रतिबंध का लोकतंत्र की मूल भावना से कोई मेल नहीं है, और यह व्यवस्था सुप्रीम कोर्ट भी दे चुका है। शिवाजी पर लिखी गई जेम्स डब्लू लेन्स की किताब- शिवाजीः हिंदू किंग इन इस्लामिक इंडिया- के मामले में सुप्रीम कोर्ट यह फैसला दे चुका है कि ऐसा प्रतिबंध अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मूल अधिकार के खिलाफ है। जुलाई 2010 में दिए फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि सरकारें उस किताब से जहां-तहां से कुछ वाक्य चुनकर यह निष्कर्ष नहीं निकाल सकतीं कि पूरी किताब पर पाबंदी लगा दी जानी चाहिए। न्यायमूर्ति डीके जैन ने उस फैसले में कहा था- “ठेस पहुंचाने वाली सामग्री में इस्तेमाल किए गए शब्दों के प्रभाव पर निर्णय विवेकपूर्ण, मजबूत दिमाग वाले, दृढ़ एवं साहसी व्यक्तियों द्वारा किया जाना चाहिए, ना कि उन कमजोर एवं ढुलमुल दिमाग वाले लोगों के द्वारा जो हर विरोधी दृष्टिकोण में खतरा सूंघने लगते हैं।”
सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी प्रतिबंध के सवाल पर एक बेहतर, ऊंचा और लोकतांत्रिक प्रतिमान तय करती है। इसे सभी स्थितियों में लागू किया जाना चाहिए और गांधीजी पर लिखी गई किताब इसका अपवाद नहीं हो सकती। इसलिए बेहतर होगा कि सरकारें ऐसे कदम ना उठाएं। अब जरूरत ऐसे मामलों में एक राष्ट्रीय सहमति बनाने की है, ताकि हर अप्रिय लगने वाली बात को कानून की ताकत से रोकने की प्रवृत्ति से बचा जा सके। गांधी के देश में गांधी के मूल्यों के खिलाफ आचरण करना आखिर कहीं से भी उचित नहीं है।