Sunday, June 19, 2011

क्या राज्य नागरिकों का दुश्मन है?


सत्येंद्र रंजन

क्या राज्य और नागरिक के बीच अनिवार्य द्वैत है और यह न सिर्फ अंतर्विरोधी, बल्कि अक्सर दुश्मनी भरा भी है? सिविल सोसायटी के नाम पर सामाजिक एवं एक हद तक राजनीतिक वैधता की तलाश कर रहे समाज के एक हिस्से की सक्रियताओं के मद्देनजर यह सवाल इन समय खासा प्रासंगिक हो उठा है। फिलहाल इस सिविल सोसायटी का मुद्दा भ्रष्टाचार है और अगर उसके नजरिए से सोचें तो यह इस वक्त देश का सबसे बुनियादी सवाल है। स्पष्टतः भ्रष्टाचार को उसके समूचे सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भों से काटकर एक राजनीतिक मुद्दा बनाने के मौजूदा प्रयासों से समाज का एक बड़ा तबका सहमत नहीं है। ना ही वह इस समूह एवं उसके समर्थकों द्वारा प्रातिनिधिक लोकतंत्र एवं संवैधानिक व्यवस्था के प्रति जताए जाने वाले अपमान भाव से इत्तेफ़ाक रखता है। सिविल सोसायटी के समर्थक बुद्धिजीवियों की सुनें, तो ये असहमत लोग राज्यवादी हैं।

उन बुद्धिजीवियों की नजर में राज्यवादी होने का मतलब है कि आप जन-हित की कीमत पर सरकार का समर्थन करते हैं। जाहिर है, जन-हित क्या है, इसे वे बुद्धिजीवी ही परिभाषित करते हैं। यानी जिसे वे जन-हित मानते हैं, अगर उससे आपकी राय अलग हो, तो उनकी नजर में आप राज्यवादी होंगे। बहरहाल, बहस के इस पक्ष पर फिलहाल ना जाते हुए यहां हम खुद को सिर्फ इस सवाल पर केंद्रित रखते हैं कि क्या प्रातिनिधिक जनतंत्र की एक व्यवस्था में राज्य और नागरिक के बीच अनिवार्य विरोधाभास है? इस सवाल पर आज इसलिए विस्तृत चर्चा की जरूरत है क्योंकि सिविल सोसायटी की बढ़ती सामाजिक गतिविधियों के साथ सार्वजनिक विमर्श में अक्सर राज्य की दैत्याकार और भयावह छवि पेश करने का चलन बढ़ता गया है। क्या सचमुच भारतीय राज्य ऐसा ही है?

राज्य अगर सामाजिक वर्ग संरचना की अभिव्यक्ति है, तो कोई भी सरकार वर्ग संबंधों के बीच शक्ति एवं हितों के संतुलन का सहज परिणाम होती है। उस सरकार को जवाबदेह और आम जन के हितों की एजेंसी बनाने का एकमात्र रास्ता समाज व्यवस्था का उत्तरोत्तर लोकतंत्रीकरण है और यह अनिवार्य रूप से एक राजनीतिक प्रक्रिया है। पिछले साठ साल का इतिहास यह है कि यह प्रक्रिया तमाम झटकों एवं कमजोरियों के बावजूद आगे बढ़ी है और आज का भारतीय राज्य इतिहास के पिछले किसी मौके की तुलना में ज्यादा जनतांत्रिक है। जनतंत्र के प्रयोग का परिणाम अवरोध एवं संतुलन की व्यवस्थाओं के क्रमिक रूप से मजबूत होने के रूप में सामने आया है और इस तथ्य को कुछ फ़ौरी घटनाओं की नज़ीर देकर झुठलाया नहीं जा सकता। इस परिघटना में नागरिक की ताकत अपेक्षाकृत बढ़ी है और यह क्रम जारी है। यही भारतीय लोकतंत्र की एक ठोस उपलब्धि रही है।

मगर यह उपलब्धि हमें तब नजर आती है, जब हम इतिहास के प्रति एक दीर्घकालिक नजरिया अपनाते हैं। तब हमें नजर आता है कि राज्य-व्यवस्था को संचालित करने में आज नागरिक की भूमिका पहले के किसी मौके की तुलना में ज्यादा है। ये नागरिक ही प्रातिनिधिक जनतंत्र की असली ताकत है। एक वर्ग विभाजित समाज में, जहां आर्थिक एवं सामाजिक विषमता की खाई बहुत चौड़ी हो, वहां यह स्वाभाविक है कि व्यवस्था सुविधा-संपन्न नागरिक समूहों के हित में चले और चलती हुई दिखे। लेकिन जनतंत्र की इस विसंगति को दूर करने का एकमात्र तरीका उस राजनीति को विकिसित और मजबूत करना है, जो राजकाज में वंचित समूहों के हितों की न सिर्फ वकालत करे, बल्कि उन्हें सुरक्षित भी करे। दुर्भाग्य से हाल के समय में ऐसी राजनीति के कमजोर होने के संकेत मिले हैं।

परंतु उस राजनीति का विकल्प जनतंत्र की प्रक्रिया को लांछित करना नहीं है। ना ही यह चित्रित करना तार्किक है कि मौजूदा राज्य-व्यवस्था का नागरिक हितों से सीधा टकराव है। बल्कि हकीकत यह है कि यह राज्य-व्यवस्था हमारी मौजूदा सामाजिक-आर्थिक (एवं सांस्कृतिक भी) परिस्थितियों का सहज परिणाम है। सिविल सोसायटी की सामने आई पूरी परिघटना जब इस हकीकत की अनदेखी करती है, अपना सारा गुस्सा एक राजनेताओं के खास समूह पर केंद्रित करती है, प्रातिनिधिक जनतंत्र की संस्थाओं के प्रति अपमान-भाव एवं अपशब्दों का इस्तेमाल करती है, तो यह सवाल उठाना जरूरी हो जाता है कि आखिर यह सिविल सोसायटी किसका प्रतिनिधित्व करती है? सही होने की आत्म-वंचना से ओत-प्रोत, खुद अपने वर्ग-चरित्र एवं आम व्यवहार से नावाकिफ (या ऐसा दिखाने की कोशिश करने वाले) इन समूहों द्वारा बताई गई देश की मुख्य समस्या एवं समाधान से आखिर हर नागरिक को क्यों सहमत हो जाना चाहिए? और यह सवाल सिविल सोसायटी के समर्थक बुद्धिजीवियों से है कि रामदेव के जमावड़े पर मामूली पुलिस कार्रवाई से उन्हें इमरजेंसी से जालियांबाग तक याद आए, लेकिन उसी वक्त पर पोस्को के लिए भूमि-अधिग्रहण से अपनी जमीन बचाने के लिए संघर्षरत परिवारों के मासूम बच्चों के बरसते पानी के बीच खड़ा रहने से उनकी संवेदना क्यों विचलित नहीं होती है?

अपने असहमत लोगों को राज्यवादी बताकर अगर वे उनके प्रति अपमान का भाव जताते हैं, तो क्या उपरोक्त प्रश्नों की रोशनी में क्या उनसे यह नहीं पूछा जाना चाहिए कि क्या वे उस परिघटना का शिकार नहीं हो गए हैं, जिन्हें डॉ. बीआर अंबेडकर ने अराजकता का व्याकरण कहा था। बहरहाल, ये तमाम सवाल हमें आगाह करते हैं कि हमें हर चलती हवा में बह नहीं जाना चाहिए। हमें संघर्ष के वर्गीय संदर्भों से आंख नहीं मूंदनी चाहिए। देश के वास्तविक एवं मुख्य अंतर्विरोध समाज एवं उसके आर्थिक ढांचे में निहित हैं। भ्रष्टाचार का संदर्भ कहीं गहरा है, इसका संबंध निरंकुश व्यवस्था में मानव के स्वभाव और उसके सांस्कृतिक इतिहास में छिपा है। इसे रोकने के लिए अवरोध एवं संतुलन की व्यवस्थाएं जरूर मजबूत होनी चाहिए, लेकिन उसके एक पहलू को लेकर कुछ महत्त्वाकांक्षी लोगों द्वारा बनाए गए भ्रम का शिकार सबको नहीं हो जाना चाहिए।

जनतंत्र निसंदेह सिर्फ निर्वाचित प्रतिनिधियों का ही अखाड़ा नहीं है। ना ही जनतंत्र का मतलब सिर्फ चुनाव है। नागरिकों का हस्तक्षेप इसका एक महत्त्वपूर्ण पहलू है। व्यक्तिगत या सामूहिक स्तर पर नागरिकों के राजनीतिक मुद्दों पर सक्रिय होने और समस्याओं के समाधान में भूमिका निभाने के अवसर जनतंत्र को समृद्ध करने के लिए ही नहीं, बल्कि इसका अस्तित्व कायम रहने के लिए जरूरी है। मगर मुश्किल तब होती है, जब कोई समूह जनतंत्र की वास्तविक प्रक्रिया से खुद को ऊपर मानने लगता है। वह नैतिकता का सारा ठेका ले लेता है और बाकी सबको भ्रष्ट एवं निकम्मा समझने लगता है। 

Friday, June 3, 2011

शर्मनाक सरकार!


जब कोई सरकार पूर्व नौकरशाहों और पेशेवर लोगों (प्रोफेशनल्स) के हाथ में पड़ जाए, तो क्या हो सकता है, इसकी संभवतः सबसे अच्छी मिसाल पिछले कुछ दिनों में देखने को मिली है। एक योगगुरु, जिनकी राजनीतिक महत्त्वाकांक्षा किसी से छिपी नहीं है, वे काला धन खत्म करने जैसे निराकार मांग को लेकर अनशन का एलान करते हैं और लोकतांत्रिक जनादेश से निर्वाचित सरकार उनके सामने रेंगने लगती है, यह नजारा देश के दीर्घकालिक भविष्य के लिए चिंतित किसी व्यक्ति को परेशान कर सकता है। या तो इस सरकार के कर्ता-धर्ताओँ में चालबाजी की अपनी क्षमता पर अति-भरोसा था, या बाबा रामदेव के अनशन के कार्यक्रम ने उन्हें बदहवास कर दिया था। वरना कोई वजह नहीं थी कि जब रामदेव उज्जैन से निजी चार्टर्ड विमान से दिल्ली हवाई अड्डे पर पहुंचे, तो वहां चार वरिष्ठ मंत्री उनकी अगवानी और वहीं उन्हें समझा लेने के इरादे से पहुंच गए। उसके बाद शुक्रवार को दो मंत्रियों ने एक फाइव स्टार होटल में बाबा से घंटों बात कर उन्हें समझाने की कोशिश की।

क्या यूपीए सरकार के पास इतनी भी राजनीति समझ नहीं है कि वह रामदेव की असली इरादे और उनके पीछे खड़ी ताकतों को पहचान सके? क्या रामदेव ने रामलीला मैदान में फाइव स्टार स्तर की तैयारी इसलिए की थी कि अंतिम वक्त पर वे अपना अनशन वापस ले लेते? बाबा रामदेव 2014 के चुनाव में देश भर में अपने उम्मीदवार उतारने की घोषणा बहुत पहले कर चुके हैं। वे उसकी जमीन तैयार कर रहे हैं। वे अन्ना हजारे की तरह किसी एक स्पष्ट मांग को लेकर अनशन पर नहीं बैठे हैं, बल्कि वे व्यवस्था बदलना चाहते हैँ। उनके पीछे धनी और मध्य वर्ग की पूरी फौज है, जिन लोगों की अपनी महत्त्वाकांक्षाएं हैं। फिर दक्षिणपंथी और रुढ़िवादी गोलबंदी का मौका देखते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक पूरी ताकत से बाबा के साथ खड़ा हो गया है।

इसलिए बाबा की चुनौती भ्रष्टाचार के मुद्दे पर नहीं, बल्कि राजनीतिक है। अगर कांग्रेस में थोड़ी भी राजनीतिक दृष्टि होती, तो वह इस चुनौती का विचार और राजनीति के मैदान में मुकाबला करती। लेकिन जब कोई पार्टी ऐसे लोगों से भरी हो, जिनके लिए राजनीति का मतलब निजी करियर, समृद्धि और प्रभाव को प्राप्त करना एवं बढ़ाना हो, तो उससे आप ऐसे सियासी नजरिए की उम्मीद नहीं कर सकते। तब एकमात्र नजरिया होता है कि किसी चुनौती का फ़ौरी हल निकालकर फिलहाल उसे टाल दिया जाए। प्रणब मुखर्जी, कपिल सिब्बल, सुबोधकांत सहाय आदि यही कोशिश करते हुए घुटनाटेक आसन में नजर आए हैं।

मनमोहन सिंह सरकार की मुश्किल यह है कि उसके राज में भ्रष्टाचार इस हद तक पहुंच गया है कि उसके पास कोई नैतिक चेहरा नहीं है। क्रोनी कैपिटलिज्म का जो खुला खेल पिछले कुछ वर्षों के दौरान हुआ है, उसके फायदे भले कॉरपोरेट जगत और अन्य बहुत से लोगों को मिले हों, लेकिन उससे चेहरा सिर्फ इस सरकार का दागदार हुआ है। इस अपराध बोध ने इस सरकार की जुबान जैसे बंद कर दी है और इसका नज़ारा बार-बार देखने को मिल रहा है।

वरना, सरकार और कांग्रेस कम से कम रामदेव के मुद्दे पर वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह के साथ खड़ी दिखतीं। दिग्विजय सिंह ने रामदेव के कारोबार, उनकी संपत्ति, उनके इरादों और उनके साथियों पर जो सवाल उठाए हैं, वे प्रासंगिक हैं। योगगुरु के रूप में बाबा ने योग, दवाओं, खाद्य सामग्रियों आदि का जो कारोबार फैलाया है, वह गौरतलब है। उनकी जिंदगी अन्ना हजारे की तरह सीधी-सादी नहीं है। उनके आसपास प्रभावशाली और धनी-मानी लोगों का जमावड़ा है। वे खास ढंग के सामाजिक और राजनीतिक विचारों के प्रवक्ता बनकर उभरे हैं और उनकी राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाएं किसी से छिपी हुई नहीं हैं। ऐसे में दिग्विजय सिंह अगर उन्हें काले धन के खिलाफ लड़ाई के लिए गलत आइकॉन बताते हैं, तो इस बात को यूं ही खारिज नहीं किया जा सकता।

मनमोहन सिंह सरकार शायद यह भूल गई है कि वह जनादेश से चुनी गई है और वह सबसे पहले संसद और विपक्ष के प्रति जवाबदेह है। इसके बावजूद वह कथित सिविल सोसायटी के प्रति नत-मस्तक नजर आती है। लोकपाल बिल पर भी उसने विपक्ष की राय तब मांगी, जब सिविल सोसायटी के प्रतिनिधियों से उसके गहरे मतभेद उभर गए। हालांकि अपनी राय अभी न देने के पीछे भारतीय जनता पार्टी की अपनी गणना एवं राजनीतिक चाल है, लेकिन ऊपरी तौर पर उसका यह कहना वाजिब है कि जब शुरुआत से उसे इस प्रक्रिया में शामिल नहीं किया गया, तो वह अभी अपनी राय क्यों दे? उसका संसद में अपनी राय बताने का रुख भी फेस वैल्यू पर सही है। जाहिर है, सरकार ऐसे तौर-तरीकों से अपने बुने जाल से निकलने में कामयाब नहीं हो सकती।

अब काले धन के मुद्दे पर भी उसने रामदेव के आगे समर्पण कर भविष्य में अपने लिए कई मुसीबतों को न्योता दिया है। ऐसे समझौतों से इस सरकार की साख लगातार खत्म हो रही है। इस लिहाज से रामदेव और उनके साथी एक जंग जीत चुके हैं। यूपीए सरकार के लिए यह शर्मनाक स्थिति है। 

Sunday, May 29, 2011

नए लेफ्ट के दिवास्वप्न


सत्येंद्र रंजन

पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चे की हार को कई बुद्धिजीवी इस उम्मीद में एक सकारात्मक घटना मान रहे हैं कि इससे देश में एक नए वामपंथ के उदय की संभावना पैदा हुई है। उनकी राय में इससे अपेक्षाकृत ज्यादा मजबूत वामपंथी आंदोलन के लिए जगह बनी है, जिसे आप चाहें तो नव-वामपंथ कह सकते हैं- एक ऐसा वामपंथ जो आम जन की आकांक्षाओं को ज्यादा रचनात्मक रूप से प्रतिबिंबित कर सके और जिसमें ज्यादा कल्पनाशीलता एवं ज्यादा ईमानदारी हो। दावा है कि भारत में कभी लेफ्ट का मतलब सिर्फ संसदीय लेफ्ट पार्टियों से नहीं रहा और उन समूहों से भी नहीं, जो जंगलों में रहकर लड़ाई में (यानी माओवादी) लगे हैं। इसके विपरीत देश में संगठनों, आंदोलनों एवं विभिन्न प्रकार के संघर्षों का व्यापक दायरा है। इस लंबी परंपरा का जिक्र करते हुए कुछ बुद्धिजीवियों ने इसके तहत फुले और अंबेडकर की परंपरा से लेकर लोकतांत्रिक समाजवादी आंदोलन और जल-जंगल-जमीन के मुद्दे पर चल रहे जन आंदोलनों की पहचान की है।

मगर प्रश्न यह है कि अगर यह व्यापक दायरा या लंबी परंपरा नव-वामपंथ का निर्माण कर सकने में सक्षम है, तो उसे अब तक ऐसा करने से किसने रोका था? अगर सीपीएम के कैडर राज ने पश्चिम बंगाल में ऐसा नहीं होने दिया, तो बाकी देश में उन्होंने ऐसे प्रयोग क्यों नहीं किए? और अब पश्चिम बंगाल में लेफ्ट फ्रंट के हार जाने से आखिर ऐसी क्या स्थिति पैदा हो गई है, जिससे ये बिखरे आंदोलन और संगठन मिलकर अब एक नव-वामपंथ की संगठित धारा पैदा कर देंगे? बात आगे बढ़ाने से पहले यह स्पष्ट कर लेना उचित होगा कि यह किसी का दावा नहीं है कि भारत में सिर्फ सीपएम या लेफ्ट फ्रंट ही वामपंथ है। यह बात बिल्कुल ठीक है कि वामपंथ की सोच एवं गतिविधियों का दायरा उनसे कहीं व्यापक है। इसीलिए लेफ्ट फ्रंट की चर्चा करते समय अक्सर संगठित लेफ्ट शब्द का इस्तेमाल किया जाता रहा है, जिसका अर्थ रहा है कि वामपंथ की वो ताकतें जिन्होंने वाम मुद्दे पर राजनीति करते हुए अपने लिए संसदीय समर्थन आधार भी जुटाया है और जिसकी बदौलत वे राष्ट्रीय राजनीति को वाम मुद्दों से प्रभावित करने की कोशिश करती रही हैं और जिसमें कई बार वे कामयाब भी होती रही हैं।

जिन स्वतंत्र ट्रेड यूनियनों, विस्थापन विरोधी संघर्षों, सांप्रदायिक हिंसा के पीड़ितों को न्याय दिलाने में जुटे संगठनों, और आरटीआई, नरेगा, वनाधिकार कानून एवं खाद्य सुरक्षा कानून जैसे प्रगतिशील कदमों के लिए आंदोलन चलाने वाले समूहों में नव-वामपंथ की उम्मीद तलाशी जा रही है, उनके संदर्भ में यह सवाल प्रासंगिक है कि क्या उनमें सांगठनिक एकता का कोई आधार है, क्या उनमें कोई वैचारिक समानता है और फिर सबसे ऊपर यह कि आखिर उनकी इतिहास दृष्टि क्या है? क्या इनके बिना कोई विचारधारा आधारित सुसंगत राजनीतिक शक्ति उभर सकती है, जो संसदीय राजनीति में दखल बना सकने में सक्षम हो? उपरोक्त तमाम संगठनों की लोकतंत्र के विकासक्रम के संदर्भ में प्रसंशनीय और प्रभावी भूमिका है। मगर इससे हम इस तथ्य से आंख नहीं मूंद सकते कि उनमें अधिकांश का एजेंडा स्थानीय और एक मुद्दा आधारित है। इसीलिए नव-उदारवादी शासन- व्यवस्था के लिए उनसे संवाद बनाना और उन्हें एक हद तक समाहित कर लेना आसान रहा है।

चूंकि समाज द्वंद्वात्मक प्रक्रिया से आगे बढ़ता है, इसलिए इस परिघटना का भी अपना महत्त्व है और इसीलिए कोई भी विवेकशील व्यक्ति इन संगठनों एवं संघर्षों की सकारात्मक भूमिका से इनकार नहीं कर सकता। लेकिन विचार-विमर्श के व्यापक दायरे में इस बात की अनदेखी नहीं की जा सकती कि विस्थापन विरोधी संघर्षों को छोड़कर बाकी तमाम संघर्षों का नेतृत्व एवं गतिविधियों का दायरा मध्य वर्ग में सिमटा हुआ है। अपनी राजनीति स्पष्ट करने की बात तो दूर रही इन समूहों ने कभी राजनीति में उतरने की इच्छा तक नहीं जताई है। उनमें से एक बहुत बड़े हिस्से का पूरा एनजीओकरण हो चुका है और वे सिविल सोसायटी के रूप में अपनी भूमिका से संतुष्ट हैं। वैसे भी स्थानीय, फ़ौरी और एक मुद्दे पर आधारित संघर्षों के साथ अक्सर यह देखा जाता है कि उसमें तीव्रता अपने मुद्दे पर होती है और अगर उस मुद्दे पर सफलता मिल जाए, तो फिर न तो वह संघर्ष और ना ही उसका नेतृत्व राजनीति के व्यापक प्रश्नों पर विचार करते हैं।

और उससे भी ऊपर बात इतिहास दृष्टि की है। मानव, समाज एवं भारतीय राष्ट्र के विकासक्रम पर इस कथित नव-वामपंथ का आखिर क्या नजरिया है? अब तक उनका विमर्श बेहद नकारात्मक, हंगामाखेज और क्षणिक भावनाओं के उबाल पर केंद्रित रहा है। उसमें समाज के द्वंद्व और लोक-चेतना की स्थिति की समझ तो सिरे से गायब ही रही है, उनमें समाज की प्रगति एवं विकास के लक्षणों को देखने और समझने के प्रति भी गजब की उदासीनता नजर आती है। बल्कि ऐसे सकारात्मक एवं विकासशील दृष्टिकोण के प्रति उनमें अपमान का गहरा भाव नजर आता है। ऐसी सोच एवं मनोवैज्ञानिक स्थिति के साथ कैसा नया वामपंथ उभर सकता है, यह विचारणीय प्रश्न है।  

दरअसल, इसी मनोविज्ञान का इज़हार हम लेफ्ट फ्रंट की हार पर खुशी एवं संतोष के अहसास में होते देख रहे हैं। यह लेफ्ट की जगह भरने को आतुर लेकिन राजनीतिक रूप से अक्षम, लेफ्ट के रूप में अपेक्षाकृत सफल- या सबसे बड़ी- ताकत से उनके बिरादराना द्रोह और मनोगत उम्मीदों की साझा अभिव्यक्ति है। यह ऐतिहासिक अनुभव है कि जाने या अनजाने में, ऐसी ताकतें व्यवहार में उन शक्तियों की राह सुगम करने का काम करती हैं, जिन्हें वे अपना मुख्य शत्रु बताती हैं। नव-वामपंथ के ताजा दिवास्वप्न की भूमिका भी उससे अलग नहीं है। 

Wednesday, May 25, 2011

लेफ्ट के आगे विकास नीति की चुनौती


सत्येंद्र रंजन

प्रकाश करात को भरोसा है कि वाम मोर्चा अपनी गलतियों में सुधार करेगा और एक बार फिर से पश्चिम बंगाल की जनता का विश्वास जीत लेगा। करात और उनकी पार्टी (माकपा) को फिलहाल मुख्य वर्गों यानी खेतिहर एवं औद्योगिक मेहनतकश तबकों पर आधारित बुनियादी सियासी रणनीति के सही होने पर कोई संदेह नहीं है। लेकिन भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव एबी बर्धन जरूरत महसूस करते हैं कि वामपंथ अब देश के मध्य वर्ग से संवाद बनाए, क्योंकि यह तबका संख्या में विशाल हो गया है। 34 वर्ष बाद पश्चिम बंगाल को गंवाने पर वाम मोर्चा नेताओं की ये फ़ौरी प्रतिक्रियाएं रही हैं। आने वाले दिनों में उन्होंने हार के पोस्टमॉर्टम का वादा किया है, और स्पष्ट है कि उससे विचार के कुछ नए बिंदु सामने आएंगे। बहरहाल, वामपंथ से सहानुभूति रखने वाले कुछ अन्य बुद्धिजीवियों ने ज्यादा निर्ममता से हार की वजहों की तलाश की है। इसमें वाम मोर्चे- खासकर माकपा- के भीतर पैदा हुए अहंकार, कार्यकर्ताओं के राजनीतिक चरित्र में गिरावट, भाई-भतीजावाद और लोकतंत्र के बुनियादी सिद्धांतों की अवहेलना का बेलाग जिक्र किया गया है। कहा जा सकता है कि ये तमाम बातें उस लहर को बनाने में मददगार बनीं, जिससे लेफ्ट का लाल किला ढह गया।  

और इससे कई राजनीतिक समूहों की मुराद आखिरकार पूरी हुई। इन समूहों को हम मोटे तौर पर तीन खंडों में रखकर देख सकते हैं। पहला समूह दक्षिणपंथ का है, जिसकी तमन्ना है कि राजनीति में लेफ्ट कोई ताकत ही ना रहे, ताकि राज्य-व्यवस्था एवं उसकी आर्थिक नीतियों को नव-उदारवाद के ढांचे में निर्बाध ढाला जा सके। दूसरा हिस्सा चरम वामपंथी समूहों का है, जिनकी समझ है कि अगर संसदीय राजनीति में संगठित वामपंथ की उपस्थिति खत्म हो जाए, तो फिर वामपंथ के पूरे फलक पर वे खुद को फैला सकते हैं। तीसरा खंड अपने को जन आंदोलन और सिविल सोसायटी कहने वाले समूहों का है, जिन्हें लगता है कि संगठित एवं संसदीय लेफ्ट की अनुपस्थिति में वे एक नए लेफ्ट का निर्माण कर सकते हैं और इस तरह अभी की हाशिये पर की अपनी हैसियत से उभर कर एक नई राजनीतिक प्रासंगिकता प्राप्त कर सकते हैं। 

लेकिन मौजूदा परिस्थितियों में हाल के विधानसभा चुनाव नतीजों से उपरोक्त तीनों समूहों में से अगर किसी की हसरत सचमुच पूरी हो सकती है, वह सिर्फ पहला खंड- यानी दक्षिणपंथ है। यह हकीकत है कि पश्चिम बंगाल में लाल किला ढहने के बाद भारतीय राजनीति में नव-उदारवाद के प्रतिरोध में खड़ा वैकल्पिक ध्रुव काफी कमजोर हो गया है। अगर यह घटनाक्रम इसी रूप में आगे बढ़ा, तो देश में लोकतंत्र की जड़ें गहरी होने की प्रक्रिया पर यह जोरदार चोट होगी। इसलिए कि नए लेफ्ट के रूप में उभरने की महत्त्वाकांक्षा रखने वाले बाकी दोनों समूहों के पास वैसी राजनीति और दृष्टि नहीं है, जो व्यवस्था में आम आदमी की भागीदारी को नियंत्रित करने की परिघटनाओं को रोक सके। संगठन शक्ति तो बिल्कुल ही नहीं है।

मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व वाला वाम मोर्चा लंबे समय तक ऐसे मंसूबों के आगे अवरोध बना रहा, तो इसलिए कि पश्चिम बंगाल में उसके पास अभेद्य दिखने वाला किला था, जिसे केंद्र में रखकर वह अपनी राष्ट्रीय भूमिका को स्वरूप दे पाता था। पश्चिम बंगाल के साथ केरल और त्रिपुरा की ताकत इस भूमिका को इतनी महत्त्वपूर्ण बनाती थी कि बाकी राजनीति उसकी अनदेखी नहीं कर पाती थी। लेकिन अब यह स्थिति बन गई है। सवाल है कि आखिर पश्चिम बंगाल के इस किले में सेंध क्यों लगी? कैडर राज, व्यवस्था से असंतोष, पार्टी के सियासी चरित्र में गिरावट आदि बातें भले एक हद तक सही हों, परंतु वो बुनियादी कारण नहीं हैं। अगर हम- पिछले दो दशकों और खासकर पिछले पांच साल की चर्चाओं एवं घटनाओं पर गौर करें तो स्पष्ट यह होता है कि इसकी बुनियादी वजह वाम मोर्चे की विकास नीति संबंधी उलझन रही है। वाम मोर्चा सरकार ने पश्चिम बंगाल में भूमि सुधार और पंचायती राज के जरिए सत्ता के विकेंद्रीकरण जैसी ऐतिहासिक उपलब्धियां हासिल की थीं। राज्य में विकास एवं प्रगति को नई जमीन देने में इन कदमों की उल्लेखनीय भूमिका रही। मगर गुजरते वक्त के साथ मुद्दा यह उठा कि इसके आगे क्या? आखिर बढ़ती आबादी की जरूरत और न्यूनतम जायदाद हासिल होने के बाद खेतिहर समुदाय बढ़ी आकांक्षाओं को कैसे पूरा किया जाए? रोजगार के नए स्रोत कहां ढूंढे जाएं? लेफ्ट के लाल झंडे की वजह से पूंजीपति बंगाल छोड़ गए थे। भारतीय राज्य-व्यवस्था में राज्य सरकारों के पास उद्योग धंधे लगाने की उतनी पूंजी नहीं होती, जिससे वह सार्वजनिक क्षेत्र का दायरा एक सीमा से ज्यादा फैला सकें। 1990-2000 के दशकों में आकर यह सवाल निर्णायक महत्त्व का हो गया। तो वाम मोर्चे ने पूंजीपतियों को बुलाकर औद्योगिक विकास की नीति अपनाई।

अब यह इतिहास का हिस्सा है कि यह कैसे नीति बैकफायर कर गई। इसकी परिणति उस सामाजिक गठबंधन के उभरने के रूप में हुई, जिसकी प्रतीक ममता बनर्जी बनीं और जिसने आखिरकार 34 साल पुराना लाल किला ध्वस्त कर दिया। मगर यह सवाल अपनी जगह कायम है कि आखिर पश्चिम बंगाल, और प्रकारांतर में किसी अन्य राज्य या समाज का विकास होना चाहिए या नहीं और अगर विकास होना है, तो उसका रास्ता क्या है? यह बिल्कुल ठीक बात है कि बुद्धदेब भट्टाचार्जी के शासनकाल में पूंजीपतियों को लुभाने की ललक इतनी जगी कि वाम मोर्चा सरकार उन्हें जरूरत से भी ज्यादा की पेशकश करती दिखने लगी।

कुछ जानकारों ने ध्यान दिलाया है कि केरल की वीएस अच्युतानंदन सरकार ने पश्चिम बंगाल से अलग विकास नीति अपनाई। इस नीति के तहत किसानों को कर्ज राहत पहुंचाई गई, राज्य में बाहर से मजदूरों के लिए कल्याण योजनाएं शुरू की गईं, सार्वजनिक कारखानों की सेहत सुधारी गई और यहां तक कि कुछ बीमार निजी कारणों को सार्वजनिक क्षेत्र में लाया गया, शिक्षा और स्वास्थ्य पर खर्च बढ़ाया गया और सार्वजनिक वितरण प्रणाली को दुरुस्त किया गया। इन तमाम कदमों को कुशलता से लागू करने का परिणाम यह हुआ कि न सिर्फ बिना निजी पूंजी को बुलाए राज्य के विकास को नई दिशा मिली, बल्कि उसके परिणास्वरूप राज्य की राजकोषीय सेहत भी बेहतर हुई और राज्य के आर्थिक विकास की दर में भारी सुधार हुआ। माना जा सकता है कि इस विकास नीति का परिणाम वाम लोकतांत्रिक मोर्चे की उस ताकत के रूप में दिखा, जिसकी वजह से चुनाव में वह सिर्फ मामूली अंतर से ही पिछड़ा।

ये दोनों अनुभव अब गंभीर अध्ययन का विषय हैं, क्योंकि देश में संगठित लेफ्ट का क्या भविष्य है, यह अब उसके द्वारा पेश की जाने वाली विकास नीति से ही तय होगा। यहां यह गौरतलब है कि बुद्धदेब भट्टाचार्जी की सरकार जिस समय टाटा और इंडोनेशिया के सलीम ग्रुप जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनियों को बुलाने में अति उत्साह दिखा रही थी, उसी वक्त उसने मध्यम एवं छोटे उद्योगों का राज्य में जाल बिछाने का प्रशंसनीय कार्य भी किया। इस पहल की वजह से, भारतीय रिजर्व बैंक के आंकड़ों के मुताबिक, पश्चिम बंगाल देश में औद्योगिक विकास के लिहाज से चौथे नंबर पर पहुंच गया। राज्य में गरीबी मिटाने, और स्वास्थ्य एवं प्राथमिक शिक्षा के क्षेत्र की सफलताएं इससे अलग हैं, जो विकास के नए पैमानों में आज कहीं ज्यादा महत्त्व रखती हैं।

मगर बड़ी एवं बहुराष्ट्रीय पूंजी को बुलाने और उसके लिए किसानों की जमीन के अधिग्रहण की नीति ने वाम राजनीति, उसकी नई दिशा और भविष्य को लेकर ऐसा द्वंद्व खड़ा किया, जिसका जवाब वाम मोर्चा नहीं ढूंढ पाया। मुसीबत यह है कि इस विभ्रम पर ज्यादा तीखे सवाल मोर्चे के समर्थकों की तरफ से उठाए गए और उन पर मोर्चा नेताओं की प्रतिक्रिया टाल-मटोल वाली रही है। यह आलोचना वाजिब है कि एक स्तर तक विकास प्रक्रिया का नेतृत्व करने के बाद वाम मोर्चा विकास के अगले चरण का कोई अलग मॉडल पेश नहीं कर पाया। बल्कि एक मौके पर आकर उसने कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी जैसे नव-उदारवादी मॉडल को स्वीकार कर लिया। इससे उसके अपने समर्थक समूहों में ना सिर्फ भ्रम, बल्कि गुस्सा भी पैदा हुआ। इसकी कीमत उसे चुकानी पड़ी है।

अब वाम मोर्चे को अपनी खोयी जमीन वापस पानी है। वह सिर्फ ममता बनर्जी की संभावित गलतियों और उनकी सरकार द्वारा लेफ्ट के प्रगतिशील एजेंडे को पलटने से पैदा होने वाली राजनीतिक परिस्थितियों के भरोसे बैठा नहीं रह सकता। बल्कि उसको विकास नीति से जुड़े सवालों से सीधे टकराना होगा। इसी संदर्भ में भाकपा नेता एबी बर्धन की मध्य वर्ग से लेफ्ट के संवाद की बात महत्त्वपूर्ण हो जाती है। सवाल है कि क्या लेफ्ट विकास की एक ऐसी नीति और उसका सुविचारित कार्यक्रम पेश करने में सक्षम है, जिसमें मेहनतकश से लेकर मध्य वर्ग तक अपना हित देख सकें? 

यह बहुत बड़ी चुनौती है, लेकिन तथ्य यही है कि इस चुनौती को स्वीकार कर सकने की क्षमता सिर्फ संगठित वामपंथ में ही है। मोर्चे को इस बात का श्रेय है कि उसने अतीत में वस्तुगत परिस्थितियों के मुताबिक विकास एवं प्रगति की नीतियां बनाईं और उन पर अमल किया है। इसमें कमियां रही हैं, और जैसाकि ऊपर के विमर्श से जाहिर है उसने गलतियां भी की हैं। मगर हम सभी जानते हैं कि कोशिश और गलती सीखने की प्रक्रिया का अनिवार्य हिस्सा हैं। मानव इतिहास में इनसे कोई बच नहीं पाता है। सकारात्मक बात यह है कि हाल के झटकों के बावजूद वाम मोर्चे के साथ एक बड़ा जनाधार है। यह जनाधार लोकतांत्रिक राजनीति से बनाया गया है। नेताओं की व्यक्तिगत ईमानदारी और विचारधारा आधारित राजनीतिक संस्कृति आज भी वामपंथी दलों की एक अतिरिक्त थाती है। बल्कि अब तो यह एक अनोखी राजनीतिक पूंजी बन गई है। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या माकपा और अन्य वामपंथी दलों के नेताओं में कुछ नया सोचने और विकास का नया मॉडल देश के सामने रखने की क्षमता और इच्छाशक्ति है? यह प्रश्न न सिर्फ इन दलों, बल्कि इस देश के व्यापक जनतांत्रिक समूहों के लिए भी आज लगभग निर्णायक महत्त्व का हो गया है, क्योंकि इसके बिना पूरे देश में प्रासंगिक वामपंथ के उदय की संभावना न्यूनतम है। अगर ममता बनर्जी की संभावित विफलताओं और केरल में सत्ता परिवर्तन के क्रम के तहत वाम दल पांच साल बाद फिर से सत्ता में आ जाएं, तब भी बिना नया एजेंडा पेश किए उन्हें वह प्रासंगिकता हासिल नहीं हो सकती, जिससे वे देश में एक मजबूत विकल्प के रूप में उभर सकें।

भारत लोकतांत्रिक प्रयोग और अपनी संवैधानिक व्यवस्था को कार्यरूप देने के जिस मुकाम पर है, उसके बीच देश के समग्र विकास की वैकल्पिक समझ और उसकी रूपरेखा की जरूरत लगातार बढ़ती जा रही है। इसीलिए सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृद्धि दर से अलग विकास की आधुनिक अवधारणाओं पर आधारित एक राजनीतिक कार्यक्रम के रूप में पेश करने की चुनौती देश की वामपंथी ताकतों के सामने है। अगर वाम मोर्चा इस जरूरत को पूरा कर सकता है, तो वह न सिर्फ प्रासंगिक बना रहेगा, बल्कि उसका भविष्य उज्ज्वल भी है। वरना, धुर वामपंथ एवं कथित सिविल सोसायटी की मदद से दक्षिणपंथ के निर्बाध आगे बढ़ने का रास्ता फिलहाल तो सुगम हो गया है।  

Friday, May 13, 2011

लेफ्ट के ढहने का मतलब


पांच विधानसभा चुनाव के नतीजों में सबसे दूरगामी महत्त्व का नतीजा बेशक पश्चिम बंगाल का है। केरल में वाम लोकतांत्रिक मोर्चे (एलडीएफ) की हार ने इस परिणाम को और गंभीर बना दिया है। इन दोनों राज्यों के चुनाव नतीजों का साझा परिणाम यह है कि अब राष्ट्रीय राजनीति में तीसरी धुरी उभरने की संभावना फिलहाल लगभग खत्म हो गई है। यह धुरी अतीत में जब भी उभरी, उसके केंद्र में वाम मोर्चा था। ऐसा इसलिए था, क्योंकि मौजूदा सियासी माहौल में सिर्फ वही वैकल्पिक नीतियों के साथ खड़ा नजर आता है। चूंकि आर्थिक एवं विकास नीतियों पर बाकी सभी दलों के बीच कोई अंतर नहीं है, इसलिए वाम मोर्चा अपनी अलग पहचान के साथ असल में दूसरा विकल्प पेश करता था। बहरहाल, चूंकि राष्ट्रीय राजनीति कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के ध्रुवों में बंटी हुई है, जिनके बीच मुख्य फर्क आर्थिक नीतियों को लेकर नही, बल्कि सामाजिक एवं सांस्कृतिक नीतियों पर है, इसलिए वाम मोर्चे पर इकट्टी होने वाली धुरी को सामान्यतः तीसरी धुरी के रूप में देखा जाता था।

पश्चिम बंगाल और केरल में हार के बाद फिलहाल वाम मोर्चा की ताकत और सियासी हैसियत दोनों में इतना ह्रास हो गया है कि वह संसद में या संसद के बाहर कोई बड़ी चुनौती पेश करने की स्थिति में अब नहीं है। इस स्थिति पर अभी भले कांग्रेस बेहद खुश हो, लेकिन यह स्थिति सबसे ज्यादा माफिक भारतीय जनता पार्टी को बैठती है। भाजपा के रणनीतिकार लंबे समय से उस दिन के इंतजार में रहे हैं, जब राजनीति कांग्रेस एवं भाजपा की धुरियों पर सिमट जाए। सीधी टक्कर में भाजपा अक्सर फायदे में रहती है। और अगर राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा ही विकल्प दिखे, तो इससे उसके प्रसार का मौका भी बनता है।

जब केंद्र में कोई तीसरा मोर्चा उभरने की संभावना ही नहीं रहे, तो राज्यों में कांग्रेस से सीधा टकराव रखने वाले क्षेत्रीय दल आखिर किस धुरी पर इकट्ठे होंगे? मसलन, अगर केंद्र में नए समीकरण बनने के हालात पैदा हों, तो तमिलनाडु में आंधी सा उठा अन्ना द्रमुक, बीजू जनता दल या तेलुगू देशम पार्टी दिल्ली में खुद को किससे जोड़ेंगे? या जगनमोहन रेड्डी अथवा तेलंगाना राष्ट्र समिति का समर्थन किसके हक में जाएगा? इसलिए अगर शुक्रवार को आए चुनाव नतीजों से भाजपा के रणनीतिकार राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) को नया जीवनदान मिलने की उम्मीद करें, तो वह शायद गलत नहीं होगा।

राष्ट्रीय राजनीति में वाम मोर्चे के कमजोर होने या अपनी अहमियत खो देने का असर यही है कि राजनीतिक एजेंडे में आर्थिक मुद्दे एवं आम आदमी के रोजी-रोजी के मसले अपनी प्राथमिकता खो देंगे। जैसाकि की एनडीए के शासनकाल में हुआ था, जब सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, सांप्रदायिकता, आतंकवाद, पाकिस्तान विरोध आदि जैसे मुद्दे राष्ट्रीय चर्चा पर छाये रहते थे। उस दौर में पश्चिम बंगाल के अपने लाल किले से सुरक्षित वाम मोर्चे ने नीतियों और कार्यक्रमों के आधार पर चर्चा में नया आयाम जोड़ने में कामयाबी पाई थी। उसका परिणाम 2004 के लोकसभा चुनाव में देखने को मिला और यह उसी दौर में उभरी राजनीति का परिणाम था कि जब यूपीए की पहली सरकार बनी, तो साझा न्यूनतम कार्यक्रम के रूप में देश के सामने एक सोशल डेमोक्रेटिक एजेंडा आया।

वह एजेंडा यूपीए शासनकाल के पहले तीन साल में सिर्फ कागज का एजेंडा साबित हो गया, हालांकि वाम मोर्चे के दबाव से मनरेगा, आरटीआई, वन अधिकार कानून, आदि जैसे कुछ दीर्घकालिक महत्त्व के कानूनी प्रावधान अस्तित्व में आ सके। लेकिन मनमोहन सिंह सरकार के अमेरिका से रिश्ते मजबूत करने के अति उत्साह ने वह राजनीतिक तालमेल भंग कर दिया। उसके बाद वाम मोर्चे ने 2009 के चुनाव में तीसरे मोर्चे को उभारने की फिर कोशिश की। लेकिन वह कोशिश नाकाम रही और इसकी एक बड़ी वजह अपने ही गढ़ों में लेफ्ट की खुद अपनी हार थी। ताजा चुनाव परिणामों ने उस परिघटना की नए सिरे से पुष्टि कर दी है।

संसदीय राजनीति से बाहर ऐसी स्थिति चरमपंथी संगठनों के माफिक बैठती है। मसलन, माओवादी भी लंबे समय से उस दिन के इंतजार में थे, जब संसदीय लेफ्ट अपना महत्त्व खो दे और जन संघर्षों की पूरी जमीन पर वे अपना दावा कर सकें। पश्चिम बंगाल के ताजा चुनाव नतीजों में माओवादियों का योगदान कम नहीं है। नंदीग्राम को युद्ध जैसे क्षेत्र में आखिर उन्होंने ही बदला था, जहां पुलिस फायरिंग के बाद लेफ्ट के पांव के नीचे की जमीन भहराने लगी थी। अब माओवादी अपना मकसद हासिल कर लेंगे, कहना मुश्किल है। मगर यह जरूर है कि इस पूरे घटनाक्रम ने नव-उदारवादी आर्थिक नीतियों, दक्षिणपंथी सियासी रुझानों एवं वाम चरमपंथ के लिए पहले से ज्यादा अनुकूल जमीन तैयार कर दी है। 

Wednesday, May 11, 2011

जश्न का यह कैसा जोश!

सत्येंद्र रंजन

चुनाव नतीजों का अनुमान लगाना हमेशा जोखिम भरा होता है। लेकिन पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव पर मीडिया और अनेक राजनीतिक हलकों में जारी चर्चाओं पर गौर करें, तो यही अनुमान उभरता है कि 34 साल पुराना लाल किला वहां ढहने वाला है। अगले शुक्रवार को नतीजे अगर इसी अनुमान के मुताबिक आए, तो यह खबर कई खेमों में जश्न का पैगाम लेकर आएगी। धुर दक्षिणपंथ से धुर वामपंथ तक में ऐसे जश्न के लिए लंबे समय से तैयारी है। वैसे दिल्ली विधानसभा के पिछले चुनाव जैसी मिसालों की भी कोई कमी नहीं है, जब शीला दीक्षित के नेतृत्व में कांग्रेस ने आम अनुमानों को झुठला दिया था। बहरहाल, अगर आम अनुमान ही सच हुए, तो आखिर तेरह मई के बाद देश की राजनीति कैसी होगी?

यह अंदाजा हम बेहतर ढंग से लगा सकते हैं, अगर पहले इस बात पर गौर कर लें कि मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व वाले वाम मोर्चे की पिछले तीन दशकों से देश में क्या भूमिका रही है? और अगर हम आज के राजनीतिक परिदृश्य पर एक नजर डाल लें, तो यह काम शायद और आसान हो सकता है। अगर आज की संसदीय संरचना पर गौर करें, तो संसद और विभिन्न विधानसभाएं नव-उदारवादी आर्थिक नीतियों पर लगभग पूरी राजनीतिक सहमति का मंच नजर आती हैं। कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी में भारतीय राष्ट्रवाद के अन्य आधार मूल्यों पर चाहे जैसी असहमति हो, आर्थिक नीतियों पर कोई असहमति नहीं है। इसका प्रतिफलन उनकी विदेश नीतियों पर भी देखा जा सकता है। एक दूसरी हकीकत यह है कि राष्ट्रीय स्तर पर पूरी सियासत इन्हीं दोनों पार्टियों कि धुरी पर गोलबंद है। जिन क्षेत्रीय या अन्य सामाजिक-राजनीतिक पृष्ठभूमियों से उभरे दलों से कभी लोकतंत्र एवं संघवाद की जड़ों को गहरा बनाने की उम्मीद जोड़ी गई थी, वे आज अपना अलग राजनीतिक परिप्रेक्ष्य लगभग पूरी तरह गवां चुके हैं और अपनी राजनीति को उन्होंने इस या उस धुरी से जोड़ लिया है। इन सबको जोड़ने वाला सबसे मजबूत पहलू क्रोनी कैपिटलिज्म (यारी-नातेदारी का पूंजीवाद) का है, जिसके सूत्रधार राजनीति के दायरे से अलग बैठे हैं, लेकिन जो अपनी धन की ताकत से राजनीति की दिशा और स्वरूप को तय कर रहे हैं।

इन परिघटनाओं ने पूरे देश में राजनीति को लगभग समरूप बना दिया है। आर्थिक मुद्दों या मुक्ति की भावना से प्रेरित सामाजिक-सांस्कृतिक मुद्दों पर गोलबंदी से बहुमत जुटाने की बातें चुनावों के वक्त भले कहीं-कहीं सुनने को मिल जाती हों, लेकिन यथार्थ में राजनीति की संचालक विचारधारा नव-उदारवाद है। इसके तहत विकास का जो मतलब है, उस पर इस पूरे राजनीतिक परिदृश्य में सहमति नजर आती है। इसके बीच क्षेपक सिर्फ वाम मोर्चा रहा है। यह ठीक है कि पश्चिम बंगाल में भूमि सुधार और पंचायती राज जैसे कार्यक्रम पर अमल के बाद राज्य के विकास की नीति को आगे बढ़ाने के सवाल पर यह मोर्चा भी भ्रम और दिग्भ्रम का शिकार हुआ। उसकी कुछ पहल नव-उदारवाद को स्वीकार करने की हद तक जाती दिखी। मगर ऐसे भ्रम आज सारी दुनिया के सामने हैं। विकास नीति की जो मुख्यधारा है, उसका स्पष्ट और सुपरिभाषित विकल्प किसी विचारधारा या राजनीतिक शक्ति के पास है, उसका प्रमाण कम से कम व्यावहारिक एवं प्रयोगात्मक स्तर पर सार्वजनिक दायरे में मौजूद नहीं है।

बहरहाल, वाम मोर्चे की संपूर्ण पहचान उपरोक्त कुछ भ्रम या दिग्भ्रम नहीं हैं। उसकी पहचान नव-उदारवाद एवं सांप्रदायिकता की लगातार आलोचना पेश करना और उसके आधार पर राजनीतिक ध्रुवीकरण की कोशिश रही है। इस क्रम में मोर्चे ने सहयोग एवं संघर्ष को साथ-साथ चलाने की रणनीति पर अक्सर कारगर अमल किया। अपने शासन वाले राज्यों में भी उसका चरित्र पूरी तरह अन्य पार्टियों की तरह रहा, यह बात बारीकियों और वस्तुगत स्थितियों के फर्क को नजरअंदाज कर ही कही जा सकती है। यह बात स्वीकार करने में किसी को हिचक नहीं होनी चाहिए कि वाम मोर्चा की सरकारें शासन की वैकल्पिक शैली का विकास करने में असफल रहीं, मगर उन्होंने मात्रात्मक या गुणात्मक कोई अलग शैली नहीं अपनाई, यह सिर्फ तथ्यों के प्रति अपमान-भाव के साथ ही कहा जा सकता है।

दरअसल, राजनीति की आम मुख्यधारा से अलग समझ, चरित्र और अभियान की बदौलत ही वाम मोर्चे ने राष्ट्रीय राजनीति अपनी एक अलग भूमिका बनाई, जो पिछले लोकसभा चुनाव में लगे झटकों के बाद कमजोर हो गई है। स्पष्ट है, उस हार के लिए वाम मोर्चा किसी और को जिम्मेदार नहीं ठहरा सकता। ना ही तेरह मई को अगर सचमुच उसका लाल किला ढह जाता है, तो उसके लिए किसी और को दोषी माना जा सकता है। यह जिम्मेदारी उसके वर्तमान नेतृत्व को स्वीकार करनी होगी। मगर उसका व्यावहारिक परिणाम यह होगा कि क्रोनी कैपिटलिज्म के नंगे नाच, नव-उदारवाद की व्यापक राजनीतिक स्वीकार्यर्ता और सांप्रदायिकता के उभार की लगातार मौजूद आशंकाओं के खिलाफ संघर्ष को गहरा झटका लगेगा एवं उसकी संभावनाएं निकट भविष्य में और कमजोर हो जाएंगी।

यह भ्रम रखना कि यह काम नव-वामपंथ करेगा, एक छलावे से ज्यादा कुछ नहीं है, क्योंकि ऐसी किसी सियासी ताकत का आज वजूद नहीं है। जन आंदोलनों और सिविल सोसायटी के नाम पर जो कुछ समूह हैं, उनके पास कोई राजनीतिक दृष्टि या राजनीति नहीं है। जिन लोगों को माओवाद जैसे चरम-वामपंथ में उम्मीद नजर आती हो, उनकी बात अलग है, क्योंकि समाज के विकास-क्रम, वस्तुगत स्थिति और मानव चेतना के स्तर से नावाकिफ रहकर रूमानी बने रहने से कोई किसी रोक नहीं सकता। बहरहाल, क्रोनी कैपिटलिज्म और नव-उदारवाद की ताकतों के साथ ऐसे कथित नव-वामपंथीं जमातों में एक जैसा ही जश्न शुक्रवार को देखते ही बनेगा, बशर्ते उनकी इच्छाओं से प्रेरित उनके अनुमान उस रोज सच हो गए!

Saturday, May 7, 2011

बधिया बना दिए जाएं बलात्कारी!


सत्येंद्र रंजन

क्या बलात्कारियों को बधिया कर दिया जाना चाहिए? दिल्ली की अतिरिक्त सेशन जज कामिनी लाउ का यही सुझाव है। उन्होंने न सिर्फ ऐसी सजा के पक्ष में अंतरराष्ट्रीय उदाहरणों का जिक्र करते हुए तर्क दिए हैं, बल्कि इसकी विधियां भी बताई हैं। कई देशों में कुछ खास स्थितियों बलात्कार के अपराधी की शारीरिक ऑपरेशन या दवाओं के जरिए यौन क्षमता छीन ली जाती है। मसलन, अमेरिका के कुछ राज्यों में ऐसा दूसरी बार यह अपराध करने पर किया जाता है, जबकि कुछ राज्यों में अपराधियों के सामने यह विकल्प होता है कि अगर वे चाहें तो ऑपरेशन करवा कर या ऐसी दवा खाकर अपनी सजा कम करवा लें। यही प्रावधान स्वीडन, डेनमार्क और कनाडा जैसे देशों में भी हैं। इस ऑपरेशन या ऐसी दवाओं का असर यह होता है कि यौन भावनाएं भड़काने वाले हारमोन का शरीर में बनना कम या खत्म हो जाता है। लेकिन ऐसी सजा में समाधान के देखने के पीछे यह दृष्टि जरूर काम करती है कि अपराध के पीछे कोई सामाजिक या सांस्कृतिक वजह नहीं है, यह सिर्फ व्यक्ति की अपनी विकृति का परिणाम है। जबकि अनेक अध्ययन यह साबित कर चुके हैं कि बलात्कार के पीछे असली वजह स्त्री को भोग की वस्तु मानने और उसके स्वंतत्र अस्तित्व एवं स्वायत्त व्यक्तित्व से इनकार की मानसिकता प्रमुख होती है।

इसीलिए जज कामिनी लाउ का यह अनुमान बिल्कुल ठीक है कि बलात्कारियों के बधियाकरण के उनके सुझाव का समाज के एक हिस्से की तरफ से कड़ा विरोध किया जाएगा। कामिनी लाउ ने उस हिस्से की पहचान भी की है और अधिकार कार्यकर्ताओं की तरफ इशारा किया है। बहरहाल, यह सुझाव जिस घटना पर फैसला देते हुए दिया गया, वह हृदयविदारक है। उस घटना में एक व्यक्ति ने उस महिला से शादी की जिसकी पहली शादी से पांच संतानें थीं। उनमें बड़ी संतान लड़की थी, जिसके ग्यारह वर्ष की उम्र के हो जाने के बाद उस व्यक्ति ने चार साल में चार बार बलात्कार किए। लड़की की मां द्वारा विरोध किए जाने पर उसे मारपीट कर घर से भगा दिया। ऐसे हिंसक एवं बलात्कारी शख्स के प्रति चरम आक्रोश अस्वाभाविक नहीं है।

जाहिर है, ऐसे मामलों में अपराधी को कठोरतम सजा देने की भावना का एक संदर्भ है। लेकिन यह संदर्भ किसी सभ्य समाज एवं विकसित न्याय व्यवस्था में अपराध और सज़ा के मकसद के कुल संदर्भ से अलग नहीं हो सकता। गौरतलब है कि जज कामिनी लाउ ने यह सुझाव महज फ़ौरी प्रतिक्रिया के रूप में नहीं दिया है। बल्कि यह एक सुविचारित सिफारिश है। उन्होंने इसके पक्ष में न सिर्फ उन्होंने अंतरराष्ट्रीय अनुभवों का जिक्र करते हुए तर्क दिए हैं, बल्कि उन्होंने इस सुझाव को विचार के लिए केंद्रीय कानून एवं न्याय मंत्रालय को भेजने का आदेश भी दिया है।

बलात्कार एक जघन्य अपराध है और इसके अपराधी से किसी तरह की हमदर्दी निसंदेह किसी को नहीं होनी चाहिए। फिर भी यह प्रश्न प्रासंगिक है कि क्या बधियाकरण इस अपराध का सही समाधान है? इस सिलसिले में दो बातें ध्यान में रखने की हैं। पहली बात तो यह कि अगर अपने समाज में बहुत से बलात्कारी बगैर सजा पाए छूट जाते हैं, तो इसकी वजह यह नहीं है कि इस अपराध के लिए सजा का प्रावधान हलका है। इसकी वजह यह है कि अपनी आपराधिक न्याय व्यवस्था विभिन्न कानूनी पेचीदगियों और सामाजिक-सांस्कृतिक वजहों से अपराधियों के जुर्म साबित नहीं कर पाती। ऐसे में सजा चाहे फांसी हो या बधियाकरण- उसका प्रावधान कर दिए जाने से तस्वीर बदलने वाली नहीं है।

दूसरी बात ज्यादा बुनियादी है। आखिर एक सभ्य न्याय व्यवस्था में सजा का उद्देश्य क्या होना चाहिए? क्या प्रतिशोध या आक्रोश की भावना से दंड तय किए जाने चाहिए? या फिर सजा का मकसद अपराधी को पछतावे एवं सुधार का मौका देना है? प्रतिशोध की भावना संबंधित व्यक्ति के मूल रूप से बुरा होने की मान्यता से निकलती है, जिसे नृतत्व एवं समाजशास्त्रीय विकास-क्रम के ताजा स्तर पर पहुंचने के बाद स्वीकार नहीं किया जा सकता। अपने लंबे इतिहास में मानव समाज ने प्रतिशोध की भावना पर आधारित कठोर से कठोर सजाओं का तजुर्बे हासिल किए हैं। लेकिन अनुभव यही है कि आंख के बदले आंख या खून के बदले खून की सजाओं से अपराध खत्म नहीं किए जा सके। जाहिर है, बधियाकरण का प्रावधान भी बलात्कार को रोकने में अक्षम रहेगा।

बलात्कार को अगर सचमुच रोकना है, तो फ़ौरी तौर पर जहां आपराधिक न्याय प्रक्रिया को दुरुस्त किए जाने की जरूरत है, जिससे अपराधियों के जुर्म साबित करने की दर बढ़े, वहीं दीर्घकालिक तौर पर स्त्री के प्रति समाज का नजरिया बदलने की जरूरत है। जब तक स्त्री के आम एवं यौन व्यक्तित्व की समाज में पूरी स्वतंत्रता स्थापित नहीं होगी, बलात्कार की मानसिकता मौजूद रहेगी। स्पष्टतः इस मानसिकता को तोड़ना एक लंबी लड़ाई है, जिसमें कानून की सिर्फ मददगार भूमिका है।

Monday, May 2, 2011

अपने लोकतंत्र का यह भी एक चेहरा है


सत्येंद्र रंजन
  
ओडीशा के धिंकिया और गोबिंदपुर गांवों में कानून के शासन और भारतीय लोकतंत्र में सबसे कमजोर तबकों से न्याय के वादों की परीक्षा थी। इन दोनों  कसौटियों पर भारतीय राज्य-व्यवस्था फेल हुई है। केंद्र सरकार ने इस नाकामी पर संघीय व्यवस्था के सम्मान का मुलम्मा चढ़ाने की कोशिश की है, लेकिन उससे पोहान स्टील कंपनी (पोस्को) के साथ पक्षपात की सरकारी मंशा संभवतः छिपाई नहीं जा सकती है।

ओडीशा सरकार पोस्को और ऐसी तमाम परियोजनाओं के हक में उस हद खड़ी रही है कि उसे एक निष्पक्ष निर्णयकर्ता के बजाय एक पक्ष ही माना जा सकता है। नियमगिरि पहाड़ियों में वेदांता की परियोजना को रद्द करने के सवाल पर भी उसका यही रुख था। पोस्को के इस्पात कारखाना लगाने, बंदरगाह बनाने और इन दोनों को जोड़ने के लिए सड़क बनाने की परियोजना के रास्ते में किसी कानूनी, पर्यावरण संबंधी या जन अधिकारों का मामला ना आए, इसके लिए बीजू पटनायक की सरकार किसी भी हद तक जाने को तैयार रही है। जब केंद्र सरकार ने पर्यावरण नियमों एवं वन अधिकार कानून के उल्लंघन के आरोपों के आधार पर पिछले साल पोस्को परियोजना पर रोक लगाई, तब पटनायक सरकार ने उसका विरोध किया था। बाद में साठ अतिरिक्त शर्तों के साथ केंद्र सरकार ने परियोजना को हरी झंडी दी, लेकिन यह शर्त लगा दी कि इस पर अमल के क्रम में वन अधिकार कानून का उल्लंघन नहीं होना चाहिए।

धिंकिया और गोबिंदपुर गांवों की पल्ली (ग्राम) सभाओं ने वन अधिकार कानून के प्रावधानों के मुताबिक अपनी बैठक कर वहां की जमीन का आवंटन अन्य वनवासी समुदायों के बीच कर दिया। गौरतलब है कि ये दोनों गांव परियोजना के लिए जरूरी 1253 हेक्टयर जमीन के बीच में पड़ते हैं। अगर ये गांव अपनी जमीन नहीं देंगे तो बंदरगाह तक सड़क ले जाने के लिए बहुत लंबा मोड़ लेना पड़ेगा, जिससे परियोजना की लागत बढ़ेगी। इसलिए पोस्को कंपनी और राज्य सरकार दोनों धिंकिया और गोबिंदपुर गांवों की जमीन के अधिग्रहण पर आमादा रही हैं। वन अधिकार कानून के तहत ग्राम सभा गांव के संसाधनों के मामले में सर्वोच्च निकाय है और उसके फैसले को पलटा नहीं जा सकता। दोनों ग्राम सभाओं के फैसले के मद्देनजर केंद्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्री जयराम रमेश ने पिछले 14 अप्रैल को राज्य सरकार से कहा था कि वह दोनों गांवों के भूमि पर दावे को वन अधिकार कानून के तहत निपटाए।

राज्य सरकार ने इसका जवाब 29 अप्रैल को भेजा। इसमें दावा किया गया कि दोनों गांवों की ग्राम सभाओं की बैठक नियमों का उल्लंघन कर आयोजित की गई। राज्य सरकार ने दावा किया कि ओडीशा ग्राम पंचायत कानून, 1964 और वन अधिकार कानून 2006 के प्रावधानों के मुताबिक ग्राम सभा की बैठक आयोजित करने के लिए संबंधित सरकारी विभाग को पर्याप्त समय रहते सूचित नहीं किया गया और बैठक में मौजूद लोगों की  संख्या तीन चौथाई आबादी से कम थी, जबकि कानून के प्रावधानों के मुताबिक कम से कम इतनी उपस्थिति होनी चाहिए। मगर पोस्को परियोजना का विरोध रहे स्थानीय लोगों के संगठन- पोस्को प्रतिरोध संग्राम समिति- का दावा है कि राज्य सरकार ने ग्राम सभाओं की बैठकों में मौजूद लोगों की संख्या को जानबूझ कर कम बताया। समिति के मुताबिक बैठक में दो हजार से ज्यादा लोग मौजूद थे और उनके दस्तखत उनके पास मौजूद हैं। लेकिन सरकार ने बैठक की कार्यवाही पुस्तिका के सिर्फ पहले पेज को स्कैन कर केंद्र को भेजा, जिस पर तकरीबन साठ लोगों के दस्तखत हैं।

केंद्र सरकार चाहती तो ओडीशा सरकार और पोस्को प्रतिरोध संग्राम समिति के दावों में अंतर की किसी स्वतंत्र कमेटी से जांच कराती। खासकर यह देखते हुए ऐसा करना उचित था, क्योंकि राज्य सरकार शुरू से एक पक्ष बनी हुई थी और अतीत में केंद्र सरकार की तीन समितियों ने पोस्को इलाके में वन अधिकार कानून एवं पर्यावरण कानून के उल्लंघन पुष्टि करते हुए केंद्र सरकार को अपनी रिपोर्ट दी थी। मगर केंद्र सरकार ने सहयोगात्मक संघीय व्यवस्था की दलील देते हुए ओडीशा सरकार की रिपोर्ट को स्वीकार कर लिया और पोस्को परियोजना को अंतिम हरी झंडी दे दी है। इस संदर्भ में जयराम रमेश का बयान गौरतलब है। उन्होंने कहा- राज्य सरकार जो कहती है, उसमें आस्था और विश्वास सहयोगात्मक संघीय व्यवस्था का अनिवार्य स्तंभ है, इसीलिए मैंने दूसरे विकल्प को अस्वीकार कर दिया है। एक लोकतांत्रिक ढंग से चुनी गई सरकार के इरादे पर केंद्र सरकार एक हद से आगे जाते हुए हमेशा सवाल खड़े नहीं कर सकती। इसके साथ ही रमेश ने एक विवादास्पद बात कही। कहा- वन अधिकार कानून पर अमल एक सीखने और निरंतर विकसित होने वाली प्रक्रिया है। इस पर पोस्को प्रतिरोध संग्राम समिति की टिप्पणी माकूल है- हम ऐसी नई अवधारणा से परिचित नहीं हैं। एक कानून पर या तो अमल होता है, या नहीं होता है। उस पर अमल किए बिना वन भूमि पर कब्जे की अनुमति देना कानून के तहत एक अपराध है और अपराध एक सीखने और निरंतर विकसित होने वाली प्रक्रिया नहीं हो सकती।

साफ है, 54 हजार करोड़ रुपए की परियोजना, जिसे देश में सबसे बड़ा प्रत्यक्ष विदेशी निवेश बताया गया है, वनवासी लोगों के हितों और कानूनी अधिकारों पर भारी पड़ी है। अपने लोकतंत्र का यह भी एक चेहरा है। 

Sunday, May 1, 2011

ये जो सिविल सोसायटी है


सत्येंद्र रंजन

एक लोकप्रिय ग़जल की तर्ज पर भ्रष्टाचार की निकली बात अब दूर तक जा रही है। भ्रष्टाचार कोई नया मुद्दा नहीं है, लेकिन पिछले एक साल से खुलते गए बड़े घोटालों के साथ यह सार्वजनिक चर्चा के केंद्र में रहा है। बीते अप्रैल के पहले हफ्ते में जब अन्ना हजारे दिल्ली में जंतर-मंतर पर अनशन पर बैठे और कॉरपोरेट मीडिया की मदद से उसे मध्य वर्ग का जबरदस्त मिला, तब से इस पर खास चर्चा हो रही है। जंतर-मंतर के आंदोलन ने भ्रष्ट नेताओं को गिद्धों को खिलाने जैसे क्रूर बड़बोलेपन और भ्रष्टाचारियों को फांसी देने जैसी मांगों के साथ भ्रष्टाचार के सवाल पर शहरी अराजनीतिक तबकों की अपेक्षाओं को अव्यावहारिक ऊंचाई तक पहुंचा दिया। जबकि अनशन पर बैठे अन्ना की मांग लोकपाल की स्थापना तक सीमित थी। उनके पास सिविल सोसायटी द्वारा तैयार जन लोकपाल विधेयक का प्रारूप था और वे चाहते थे कि सरकार उसे स्वीकार कर ले। बहरहाल, लोकपाल की स्थापना के विधेयक को तैयार करने के लिए केंद्रीय मंत्रियों और सिविल सोसायटी के सदस्यों की साझा समिति बनने के साथ अन्ना के आंदोलन का कम से कम जंतर-मंतर का चरण तो पूरा हो गया।

अन्ना के मंच पर विभिन्न समझ और आस्थाओं वाले लोग पहुंचे। उन्हें जोड़ने वाला एक ही पहलू था- भ्रष्टाचार का विरोध। वहां भ्रष्टाचार को लेकर गुस्सा दिखा और निशाने पर राजनेता और देश की प्रातिनिधिक राजनीतिक संस्थाएं थीं। सिर्फ सरकार और संसद के प्रति वहां अपमान का भाव नहीं था, बल्कि संविधान को फाड़ डालने जैसी बातें भी की गईं। जब तक अन्ना हजारे ने नरेंद्र मोदी की तारीफ नहीं कर दी, उनके इर्द-गिर्द जुटे धुर दक्षिणपंथी से धुर वामपंथी समूहों एवं लोगों में इस आजादी के दूसरे आंदोलन के परिप्रेक्ष्य एवं इसमें सहभागी लोगों के वर्ग-चरित्र एवं उद्देश्यों पर कोई सवाल नहीं उठाए गए। भ्रष्टाचार की एक साझा समझ पर वहां बाबा रामदेव और आरएसएस से लेकर सीपीआई- एमएल के कुछ गुटों के नेता एवं कार्यकर्ता सहमत थे। इनके बीच कथित जन आंदोलनों एवं सिविल सोसायटी के प्रतिनिधि तो थे ही, जिनका फ्रीलांस एजेंडा पहले भी सवालों के घेरे में रहा है।

मगर भ्रष्टाचार की ऐसी व्याख्या की सुविधा ज्यादा समय तक नहीं टिकी। भारत जैसे क्रियाशील लोकतंत्र की यही विशेषता है कि इसमें किसी एजेंडे, विचार या कार्यक्रम पर किसी एक समूह का एकाधिकार बनाए रखना मुमकिन नहीं होता। तो अब भ्रष्टाचार के जंतर-मंतर वाले संस्करण पर विभिन्न खेमों से समीक्षा और आलोचना का दौर है। और नतीजा यह है कि जंतर-मंतर वाली सिविल सोसायटी के प्रतिनिधि अपने रैडिकल साथियों के बीच में जाकर यह कहने लगे हैं कि 1991 से लागू हुई नई आर्थिक नीतियां ही विशुद्ध रूप से वो कारण हैं, जिनकी वजह से आज देश में भ्रष्टाचार इतना फैल गया है।

ये रैडिकल साथी जब दिल्ली में जुटे तो जंतर-मंतर की जन क्रांति का पोस्टमार्टम हुआ। लेखिका अरुंधती राय के इन शब्दों पर गौर कीजिए- अन्ना हजारे और उनकी टीम को समर्थन देने के लिए जंतर-मंतर पर जुटी लाखों लोगों की भीड़ के सामने, जिनका गुस्सा समझा जा सकता है, भ्रष्टाचार को एक नैतिक सवाल के रूप में पेश किया गया। इसे एक राजनीतिक या व्यवस्था से जुड़े प्रश्न के रूप में सामने नहीं रखा गया- इसे रोग के लक्षण के रूप में नहीं, बल्कि खुद के रोग के रूप में सामने रखा गया। जिस व्यवस्था की वजह से भ्रष्टाचार होता है, उसे बदलने या ध्वस्त करने की कोई अपील नहीं की गई। शायद इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है, क्योंकि जंतर-मंतर पर पहुंचे मध्य वर्ग के बहुत से लोग और वहां के जमावड़े के प्रसारण लिए पहुंचा कॉरपोरेट प्रायोजित मीडिया उन आर्थिक सुधारों से लाभ पाने वालों में रहे हैं, जिनके परिणामस्वरूप भ्रष्टाचार इस सीमा तक पहुंचा है। इन्हीं लोगों ने इसे क्रांति- भारत का तहरीर चौक- बताया। इसलिए इसमें कोई हैरत की बात नहीं है कि कई कॉरपोरेट सीईओज ने इस अभियान को उदारता से लाखों रुपए चंदे दिए, सेलफोन कंपनियों ने मुफ्त एसएमएस संदेश की सुविधाएं दीं- आखिर कॉरपोरेट सेक्टर एवं कॉरपोरेट मीडिया के पास अपनी सार्वजनिक छवि को सुधारने का एक मौका था, जो 2 जी स्पेक्ट्रम घोटाले के खबरों में आने के समय से खराब हो गई थी। अरुंधती राय की यह टिप्पणी भी इस संदर्भ में ध्यान देने लायक है- जब भ्रष्टाचार को अस्पष्ट और सतही रूप से एक नैतिक समस्या के रूप में देखा जाता है, तो हर कोई खुशी-खुशी उसके खिलाफ एकजुट होता जाता है। इनमें फासिस्ट, डेमोक्रेट, अराजकतावादी, भक्त बाबा, तफरी करने वाले, दक्षिणपंथी, वामपंथी और यहां तक कि घोर भ्रष्ट भी शामिल रहते हैं, जो शायद सबसे ज्यादा उत्साह से प्रदर्शन में हिस्सा लेते हैं।

अब जंतर-मंतर की क्रांति पर राष्ट्रीय सलाहकार परिषद की सदस्य और सिविल सोसायटी की एक प्रमुख नाम अरुणा राय के विचार सुनिए- 2007 में 25,000 आदिवासी भूमि विवादों को हल करने की मांग करने के लिए भोपाल से पैदल चलकर दिल्ली आए थे। तब कुछ ही (टीवी) कैमरा वहां पहुंचे। कोई सड़कों पर उनका स्वागत करने या समर्थन देने नहीं आया। आखिर वे सिविल सोसायटी नहीं थे, बल्कि गरीब मेहनतकश थे! ... एक दलित नेता ने कुछ दिन पहले जयपुर में एक जन सुनवाई के दौरान कहा कि घूस देने और लेने में मददगार मध्य वर्ग जंतर-मंतर पर हवन और भजन करके प्रायश्चित कर रहा है। लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व की मांग को लोकतांत्रिक व्यवहार की जिम्मेदारी से रू-ब-रू होना पड़ता है। सिविल सोसायटी एक बहुत कमजोर शब्द है, जो जितना कुछ बताता है, उससे ज्यादा छिपाता है। भारत जैसे देश में, जहां वर्ग एवं जाति जैसे इतने बुनियादी विभाजन हैं, वहां यह शब्द और भी कम उचित है।

विडंबना यह है कि जंतर-मंतर की क्रांति ने जहां एक तरफ भ्रष्टाचार की सतही समझ पेश की, वहीं उसने अभिजात्य और गैर-प्रातिनिधिक सिविल सोसायटी को सार्वजनिक चर्चाओं में प्रतिष्ठित बना दिया। वैसे यह प्रतिष्ठा तो ज्यादा टिकाऊ साबित नहीं हुई है, लेकिन इससे यह मौका हमें जरूर मिला है कि हम भारतीय सिविल सोसायटी के स्वरूप एवं चरित्र को अब बेहतर ढंग से समझ सकें। कहा जा सकता है कि गजल की पंक्ति- बात निकलेगी तो दूर तलक जाएगी- सिविल सोसायटी पर चर्चा के संदर्भ में भी सटीक बैठती है। अन्ना हजारे के अनशन के संदर्भ में यह शब्द जितना चर्चित हुआ है, भारत में शायद वैसा पहले कभी नहीं हुआ। इस क्रम में इस अवधारणा, सिविल सोसायटी की भूमिका और उसकी प्रासंगिकतको नए सिरे से समझने की कोशिश की गई है। इसी संदर्भ में इटली के मशहूर राजनीतिक चिंतक एंतोनियो ग्राम्स्की की उस समझ का हवाला दिया गया है, जिसके मुताबिक सिविल सोसायटी पूंजीवादी व्यवस्था का वह संवेदनशील वर्ग है, जिसे उत्पीड़ित तबकों द्वारा शासक वरगों के प्रभुत्व को चुनौती देने के संघर्ष में सहायक बनाया जा सकता है। एक अन्य समझ के मुताबिक सिविल सोसायटी राज्य, बाजार एवं नागरिकों के बीच का वह सार्वजनिक दायरा है, जिसमें लोग बहस और पहल कर सकते हैं। जबकि सिविल सोसायटी की एक अपेक्षाकृत अधिक संकरी धारणा के मुताबिक यह शब्द राजकीय संस्थाओं से बाहर मौजूद सामाजिक ढांचों और हितों के लिए इस्तेमाल होता है।

दुनिया के जिन हिस्सों में प्रातिनिधिक जनतंत्र अपनी जड़ें जमा चुका है, वहां अब चुनौती यह है कि इस व्यवस्था को जन अपेक्षाओं के प्रति कैसे ज्यादा जवाबदेह बनाया जाए। इसके लिए नए तौर-तरीकों पर विचार हो रहा है। इसके बीच सिविल सोसायटी का हस्तक्षेप भी एक तरीका है और अगर यह एक निरंतर परिघटना के रूप में स्थापित हो जाए, तो संभवतः सरकारों एवं विधायिका को जन इच्छाओं की अभिव्यक्ति का बेहतर उपकरण बनाया जा सकता है। लेकिन यह गौरतलब है कि आखिर सिविल सोसायटी भी कोई निरपेक्ष चीज नहीं है, और जैसाकि अरुणा राय के उद्धरण से जाहिर है, उसे किसी समाज के खास संदर्भों एवं परिस्थितियों से काटकर नहीं देखा जा सकता।

अगर भारतीय संदर्भ में देखें तो सिविल सोसायटी के दायरे में आने वाले व्यक्तियों एवं संगठनों की मोटे तौर पर एक खास पहचान तलाशी जा सकती है। व्यक्तियों पर गौर करें, तो इनमें अक्सर उच्च मध्य एवं मध्य वर्ग के चेहरे नजर आएंगे, जो अपनी राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाएं चुनावी राजनीति में प्रत्यक्ष भागीदारी से पूरी करने में अक्षम रहते हैं। संगठनों के तौर पर इसमें ज्यादा उपस्थिति ऐसे समूहों की है, जिनकी पहचान एनजीओ के रूप में की जा सकती है। ये व्यक्ति या संगठन किसी सुस्पष्ट विचारधारा, इतिहास दृष्टि या राजनीति की बात आम तौर पर नहीं करते और अधिकांशतः यह उनके पास होती भी नहीं है। वे कुछ प्रासंगिक मुद्दों को उठाते हैं, उनके प्रति समाज में समर्थन जुटाते हैं, और उससे अपनी एक सीमित भूमिका बनाते हैं। ये मुद्दे सकारात्मक से लेकर नकारात्मक और यहां तक कि विध्वंसात्मक भी हो सकते हैं।

अन्ना हजारे के समर्थन में निसंदेह भ्रष्टाचार एवं घोटालों के लगातार खुलासों से त्रस्त आम लोग- खासकर शहरी नौजवान जुटे, लेकिन उनके अभियान की केंद्रीय ताकत यही सिविल सोसायटी थी। मुद्दा भ्रष्टाचार था, जिसकी मार हम सबको झेलनी पड़ती है, लेकिन इस पर कोई ठोस या मूर्त राजनीतिक मांग पेश करना हमेशा कठिन रहा है। जेपी आंदोलन से लेकर वीपी सिंह के अभियान तक भ्रष्टाचार के नाम पर हंगामा तो खूब हुआ, लेकिन हंगामा मचाने वाले लोगों के हाथ में जब राजनीतिक सत्ता आई, तो सूरत बदलने की कोई पहल वे नहीं कर सके। इसकी वजह सिर्फ यह नहीं है कि उनमें इरादा नहीं था। बल्कि ज्यादा ठोस वजह यह है कि एक ऐसी बुराई, जो लगभग हर जगह फैली हो और जिसमें लगभग सभी लोग किसी ना किसी रूप में भागीदार हों, उसे जन-जागरूकता को बढ़ाते हुए और अवरोध एवं संतुलन की व्यवस्था को लगातार मजबूत करते हुए कम तो किया जा सकता है, लेकिन उसका कोई जादुई समाधान नहीं हो सकता।

ताजा प्रसंग में लोकपाल बिल को ऐसी जादुई मांग के रूप में पेश कर सिविल सोसायटी अपने अभियान के प्रति मध्य वर्ग में खासा समर्थन जुटाने में सफल रही है। मगर अपने जिस प्रारूप (कथित जन लोकपाल बिल) के आधार पर उसने इस मुद्दे पर एक तरह का चरमपंथी नजरिया पेश किया, उसे सरकार के साथ बनी ड्राफ्टिंग कमेटी की पहली बैठक से पहले उसे खुद ही बदलना पड़ा। इससे इस संदर्भ की व्यावहारिक सीमाएं साफ हो गई। अब सिविल सोसायटी के ज्यादा बड़े दायरे के साथ संवाद से यह भी साफ होता जा रहा है कि संभवतः न्यायपालिका प्रस्तावित लोकपाल के दायरे से बाहर रहेगी और यह भी मुमकिन है कि जन लोकपाल के समर्थक आखिरकार प्रधानमंत्री को भी उससे बाहर रखने पर सहमत हो जाएं।

सिविल सोसायटी के कथित प्रतिनिधियों रुख में यह बदलाव उनकी परिपक्वता को जाहिर करता है, मगर यहां प्रश्न जरूर प्रासंगिक है कि अव्यावहारिक बातों पर किसी आंदोलन के दौरान भावनाएं भड़काना आखिर कितना नैतिक एवं उचित है? यह व्यवहार उन नेताओं या राजनीतिक दलों से कैसे अलग है, जिन्हें गिद्धों को खिलाने की बात अन्ना हजारे के मंच से सुनी गई? और फिर अपने लोगों के संपत्ति मोह, भ्रष्ट आचरण और अनियमितताओं का हर हाल में बचाव करने की मजबूरी राजनीतिक दलों के प्रवक्ताओं से किस अर्थ में अलग है?

फिलहाल मीडिया में मिल रहे महत्त्व से प्रफुल्लित सिविल सोसायटी का यह हिस्सा भले अभी यह महसूस ना करे, लेकिन इस व्यवहार से उसकी साख समाज के एक बड़े दायरे में संदिग्ध हो गई है। इतिहास दृष्टि के प्रति उपेक्षा-भाव, अयथार्थवादी सोच, अभिजात्यवादी एवं दक्षिणपंथी रुझानों, सांप्रदायिकता के प्रति नरमी, और सबसे ऊपर नैतिकता एवं शुचिता के प्रश्नों पर दोहरे मानदंडों ने उसके इरादों पर गहरे सवाल खड़े कर दिए हैं। और इस पृष्ठभूमि में यह प्रश्न उठा है कि क्या यह वही सिविल सोसायटी है, जिसकी परिकल्पना या व्याख्या एंतोनियो ग्राम्स्की ने की थी? या यह अगंभीर और बिना की किसी स्पष्ट उद्देश्य वाले वैसे लोगों की भीड़ है, जो जंतर-मंतर जैसी क्रांति में अपनी व्यक्तिगत महत्त्वाकांक्षाओं को पूरा कर लेने का मौका देखते हैं?

Friday, April 29, 2011

अब बन जाएगा सांप्रदायिक हिंसा कानून?


सत्येंद्र रंजन

सांप्रदायिक हिंसा निवारक विधेयक का नया मसविदा अब हमारे सामने है। 2004 में जब संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सत्ता में आया, तब उसने अपने साझा न्यूनतम कार्यक्रम में सांप्रदायिक हिंसा से निपटने के लिए एक विशेष कानून बनाने का वादा किया था। लेकिन पिछले सात साल में बात मसविदों से आगे नहीं बढ़ी है। जब सरकार ने इस कानून का अपना मसविदा पेश किया, तो उस पर कई हलकों से एतराज उठे थे। एतराज उठाने में सिविल सोसायटी के धर्मनिरपेक्ष हिस्से के वे संगठन भी थे, जो लंबे समय से ऐसे एक ऐसे कानून की मांग करते रहे हैं। उनकी मुख्य आपत्ति इस बात को लेकर थी, प्रस्तावित कानून के जरिए प्रशासन को और ताकत देने की बात कही जा रही थी, जबकि उन संगठनों की राय में जरूरत प्रशासन को जवाबदेह बनाने की है।

एक राय यह भी उभरी कि प्रस्तावित कानून के प्रावधान देश के संघीय ढांचे का उल्लंघन करने वाले हैं। गौरतलब है कि कानून-व्यवस्था राज्यों के अधिकार क्षेत्र का विषय है और इस तरह दंगों से निपटने की प्राथमिक जिम्मेदारी राज्य सरकार की ही होती है। अगर प्रस्तावित कानून के तहत किसी इलाके को दंगा प्रभावित क्षेत्र घोषित कर वहां सीधे दखल देने का अधिकार केंद्र को मिल जाए, तो इस पर राज्यों एवं खासकर क्षेत्रीय दलों को आपत्ति होना स्वाभाविक है। प्रस्तावित कानून की एक और आलोचना यह भी रही है कि उसमें सिर्फ सांप्रदायिक दंगों को ध्यान में रखा गया है, जबकि जातीय, भाषाई और अन्य कमजोर तबकों पर होने वाली हिंसा को पर्याप्त महत्त्व नहीं दिया गया है।

अब सोनिया गांधी की अध्यक्षता वाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद (एनएसी) ने कानून के नए प्रारूप में इन आलोचनाओं का समाधान ढूंढने की कोशिश की है। गृह और विधि मंत्रालयों को भेजे जा रहे प्रारूप का नाम- सांप्रदायिक एवं लक्ष्य केंद्रित हिंसा निवारण (न्याय प्राप्ति एवं क्षतिपूर्ति) विधेयक, 2011 रखा गया है। जाहिर है, अब विधेयक का दायरा ज्यादा बड़ा है। मसविदे में जिस राष्ट्रीय प्राधिकार की स्थापना का सुझाव दिया गया है, उसके बारे में अब सफाई दी गई है कि यह संस्था ना तो कानून लागू करने वाली मौजूदा मशीनरी के ऊपर होगी और ना ही यह वर्तमान प्रशासनिक एवं न्यायिक तंत्र की शक्ति छीनेगी। बल्कि यह सिर्फ सलाह देने वाली संस्था होगी, लेकिन यह सलाह जवाबदेही के संदर्भ में होगी। मसलन, अगर कोई राज्य सरकार इस संस्था की सलाह को नजरअंदाज कर देती है और उसके परिणास्वरूप बड़े पैमाने पर हिंसा या जन संहार घटित हो जाता है, तो वह सलाह एक ऐसा ठोस दस्तावेज होगा, जिसके आधार पर अदालत में कर्त्तव्य निभाने में लापरवाही या जानबूझ कर कोताही का मुकदमा चलाया जा सकेगा। यानी प्रस्तावित संस्था के पास प्रशासन को सीधे आदेश देने का अधिकार तो नहीं होगा, लेकिन उसे एक ऐसी व्यवस्था के रूप में स्थापित किया जाएगा, जिसके परामर्श को राज्य सरकारें या प्रशासन गंभीरता से लें और ऐसा न करने पर उसके परिणाम भुगतने को तैयार रहें।

दरअसल, राष्ट्रीय प्राधिकार प्रस्तावित कानून का केंद्रीय पहलू है। उसमें सात सदस्य रखने का सुझाव दिया गया है, जिनका चयन प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता, गृह मंत्री और लोकसभा में सभी राष्ट्रीय दलों के नेताओं की समिति करेगी। सुझाव दिया गया है कि समिति में अनिवार्य रूप से चार सदस्य अल्पसंख्यक समुदायों से और एक महिला हो। एनएसी के प्रारूप में सिविल सोसायटी के संगठनों की यह राय झलकती है कि सरकारी मशीनरी के अधिकार और बढ़ाने की जरूरत नहीं है, बल्कि आवश्यकता यह सुनिश्चित करने की है कि जो अधिकार उसे मिले हुए हैं, सांप्रदायिक या अन्य लक्ष्य केंद्रित दंगों के समय प्रशासन उन अधिकारों का ठीक ढंग से इस्तेमाल करे।

गौरतलब है कि सांप्रदायिक दंगों या जन संहार से निपटने के लिए एक खास कानून हो, इसकी जरूरत गुजरात दंगों के बाद ज्यादा शिद्दत से महसूस की गई थी। उसके साथ 1983 के नेल्ली जन संहार, 1984 के सिख विरोधी दंगों, 1992-93 के मुंबई दंगों आदि का भी अनुभव था। इनमें से कोई दंगा इसलिए नहीं हुआ कि प्रशासन के पास उन्हें रोकने की ताकत या अधिकार नहीं थे। बल्कि वे राजनीतिक ताकतों की सक्रिय भागीदारी, उनके प्रभाव में प्रशासन द्वारा कर्त्तव्य निभाने में लापरवाही या कहीं-कहीं प्रशासन की मिलीभगत से हुए। इसलिए यह उचित एवं स्वाभाविक ही है कि अगर ऐसा कोई कानून बन रहा है, तो उसमें प्रशासन की जवाबदेही तय करने पर मुख्य ध्यान हो।

इस लिहाज से एनएसी के प्रारूप के कुछ सुझाव महत्त्वपूर्ण हैं। मसलन, यह कि दंगा होते ही पुलिस प्रमुख सभी टेलीकॉम सेवा प्रदाता कंपनियों को उस इलाके में टेलीफोन कॉल से संबंधित तमाम दस्तावेजों को सुरक्षित रखने के लिए अधिसूचना जारी करें। सभी सरकारी एवं निजी अस्पतालों को तमाम मेडिकल रिकॉर्ड सुरक्षित रखने के लिए अधिसूचित किया जाए। पुलिस विभाग पुलिस कंट्रोल रूम एवं इलाके के सभी थानों में केस डायरी, स्टेशन डायरी और जांच एवं अदालती कार्यवाही से संबंधित अन्य सभी दस्तावेज सुरक्षित रखना अनिवार्य हो। उपरोक्त तमाम दस्तावेजों की जरूरत गुजरात में चली अदालती कार्यवाही के दौरान महसूस की गई थी। एक दूसरा अहम सुझाव यह है कि प्रस्तावित कानून के तहत अफसरों पर मुकदमा चलाने के लिए सरकार से अनुमति लेने का प्रावधान अनिवार्य रूप से लागू नहीं होगा। केंद्र या राज्य सरकारों को मुकदमा चलाने की अर्जी पर 30 दिन के अंदर फैसला लेना होगा। अगर उन्होंने ऐसा नहीं किया तो माना जाएगा कि उन्होंने मुकदमा चलाने की इजाजत दे दी है। अगर उन्होंने ये अर्जी ठुकराई तो उन्हें इसका कारण बताना होगा। अगर कोर्ट उन कारणों से संतुष्ट नहीं हुआ, तो मुकदमा चलाने के सवाल पर खुद फैसला करने में वह सक्षम होगा।
अब प्रश्न है कि क्या यह प्रारूप सिविल सोसायटी को संतुष्ट करने में सक्षम है, क्या इस पर राजनीतिक सहमति बनेगी, और क्या यह केंद्र सरकार को मंजूर होगा? जहां तक सांप्रदायिक या जातीय दंगों का सवाल है, कानून उनसे निपटने का सिर्फ एक पक्ष है। दूसरा पक्ष वह राजनीति विकसित करना है, जो ऐसे सामाजिक-सांस्कृतिक विभाजनों पर खड़ी ना हो, बल्कि आम जन के रोजी-रोटी के मुद्दों पर केंद्रित हो। अब न सिर्फ भारत, बल्कि दुनिया भर में अध्ययनों से यह साबित हो चुका है कि दंगे राजनीतिक गोलबंदी एवं समर्थन जुटाने का माध्यम होते हैं। ऐसी मिसालें बेहद कम होंगी, जब ये प्रशासनिक विफलता का परिणाम रहे हों। यह ठीक है कि कानूनी अवरोध एवं संतुलन की व्यवस्था एक सही दिशा में कदम है, लेकिन आने वाले समय में इस बहस को इस कदम से आगे ले जाने और दंगों के राजनीतिक स्वरूप को समझने की जरूरत बनी रहेगी।